भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ६ )

तक भोगे गये हैं, वे भी विषय-सुख चाहनेवालेको, अन्त समयमें, दुःखोंके ही कारण होते हैं ॥३॥

खुलासा ।

इस जीवनमें सुखका लेश भी नहीं है। जिनके पास अक्षय लक्ष्मी, धन-दौलत, गाड़ी-घोड़े, मोटर, नौकर-चाकर, रथ-पालकी प्रभृति सभी सुखके सामान मौजूद हैं, राजा भी जिनकी बातको टाल नहीं सकता, जिनके इशारोंसे ही लोगों का भला या बुरा हो सकता है, ऐसे सर्वसुख-सम्पन्न लोग भी, चाहे ऊपरसे सुखी दीखते हों, पर वास्तवमें सुखी नहीं हैं; भीतर-ही-भीतर उन्हें भी घुन खाये जाता है; किसी न किसी दुःखसे वे जर्जरित हुए जाते हैं। इस मौकेकी दो कहानियाँ हमें याद आई हैं। हम उन्हें दृष्टान्तके तौर पर यहाँ लिखते हैं :—

एक महात्मा अपने शिष्यके साथ किसी नगरमें गये। वहाँ उन्होंने देखा कि, एक साहूकार इन्द्रभवन जैसे मकानमें बैठता है, सैकड़ों सेवक आज़ापालनको तैयार खड़े हैं, जोड़ी-गाड़ी द्वारपर खड़ी हैं, हाथी झूम रहे हैं, सामने सोने चाँदी और हीरे पत्तोंके ढेर लग रहे हैं। महात्माको देखकर सेठने अपने एक कर्मचारीको उनको भोजन करानेकी आज्ञा दी। जब गुरु चेले भोजन करने बैठे, तब चेला बोला—“गुरु-जी ! आप कहते थे, संसारमें कोई भी सुखी नहीं है। देखिये,