भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ५ )

कुरडलिया ।

परिडत मत्सरता भरे, भूष भरे अभिमान । और जीव या जगतके, मूरख महाअजान ॥ मूरख महा अजान, देखके संकट सहिये । द्वन्द्व प्रबन्ध कवित्त, कान्यरस कासों कहिये ॥ वृद्ध भई मनभैंहि, मधुर बाणी गुणमण्डित । अपने मनको मार, मौन घर बैठत परिडत ॥२॥

2 The learned are full of jealousy; the wealthy are intoxicated with vanity; while others are in the hold of ignorance. Hence there is no other resource for one's literary talents save that of their being suffocated within one's own self.

न संसारोत्पन्नं चरितमनुपर्यामि कुशलं । विपाकः पुण्यानां जनयति भयं मे विमृशतः ॥ महद्भिः पुण्यो वैश्चिपरिगृहीताश्च विषया । महान्तो जायन्ते व्यसनमिव दातुं विषयिणाम् ॥३॥

मुझे संसारी कामोंमें जरा सुख नहीं दीखता। मेरी रायमें तो पुण्यफल भी भयदायक ही हैं। इसके सिवा, बहुतसे अच्छे-अच्छे पुण्यकर्म करनेसे जो विषय-सुखके सामान प्राप्त किये और चिरकाल