वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४ )
की आज्ञा करना भूल है। अब रहे धन-गन्वों ; धनसे मतवालों की तो बात ही न पूछिये। प्रथम तो उन तक पहुँचना ही कठिन काम है। यदि पहुँच भी गये, तो उन्हें अवकाश ही नहीं मिलता। सैकड़ों बार उनकी देहलकी धूल चाटने पर कदा-चित् ही कभी नम्बर आवे-तो-आवे। फिर ; वहाँ पराई बुराई करनेवालों या जुगलझोरोंकी तूती बोलती है, अतः वहाँ भी सफलता नहीं होती। इन दोनों प्रकारके लोगोंके सिवा, जो तीसरे प्रकारके लोग हैं, वे तो निरं मूर्ख—अज्ञानी या कोरे बाबाजी हैं। उनको किसी प्रकारका ज्ञान ही नहीं, वे सुभाषित और कुभाषित, सुशिक्षा और कुशिक्षा, काव्य और अलङ्कार को समझते ही नहीं। ऐसी दशामें क्रूरदान या गुणप्राहक के अभावसे खामुखाह मनमें विरक्ति या वेदना होती है। मन दुःखी होकर कहता है—“हाय ! रसिक और समझदारोंके दिल-साफ नहीं हैं, उनके चित्त मत्सरतासे कलुषित हो रहे हैं। धनवानोंको धनके नशेके मारे कुछ सूझता ही नहीं, वे किसीसे बात ही नहीं करते। अज्ञानियोंकी समझमें कुछ आ नहीं सकता। अब हम अपना पाण्डित्य या कायीगरी कित्ते दिखावे ?
शिक्षा—जो तुम्हारी तरफ मुखातिब हों, तुम्हारी बातों पर काम द, तुम्हारी बातोंको ध्यानसे सुनें, उन्हींको अपनी बातें सुनाओ। जो तुम्हारी बातें सुनना न चाहें, उनके गले मत पड़ें। ऐसा करनेसे आपकी आत्म-प्रतिष्ठामें बड़ा लगेगा—आपका अपमान होगा।