भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ३ )

दूसरे प्रकारके लोग जो धनी हैं, वे अपने धनके गर्वसे भुले हुए हैं। उन्हें धन-भदके कारण कुछ सूझता ही नहीं, उन्हें किसीसे बातें करना या किसीको सुनना ही पसन्द नहीं ; अतः उनसे भी कुछ लाभ नहीं। अब रहे तीसरे प्रकारके लोग ; वे नितान्त मूर्ख या अज्ञानी हैं ; उन गँवारोंमें अच्छे-बुरेकी तमीज नहीं, अतः उनसे कुछ कहने या अपनी कृति दिखाने सुनानेको दिल नहीं चाहता ; इसलिये हमारे मुँहसे निकल सकनेवाले उत्तमोत्तम विचार, निबन्ध, काव्य या सुभाषित संसारके सामने न आकर, हमारे शरीरमें ही नष्ट हुए जाते हैं, हमारा परिश्रम व्यर्थ जाता है और संसार हमारे कामके देखने और लाभान्वित होनेसे वञ्चित रहता है !

और भी स्पष्ट ।

संसारमें धमण्डियोंकी संख्या बहुत है। कितने हो अपनी विद्याके गर्वसे चूर हो रहे हैं और कितने हो लक्ष्मीके नशे से मतवाले हो रहे हैं। यदि कोई विद्वान् या कारीगर विद्या-गर्वियोंके पास जाता है, तो अब्बल तो वे धुरन्धर विद्वान् बेचारेको पास ही नहीं फटकने देते और यदि कोई श्रीचरणों में पहुँच गया, तो वे उसके कामके उत्तम अंशों पर ध्यान न देकर, बुरे अंशोंको देखते हैं और उसमें तरह-तरहके दोष निकालकर उसके दिलको चोट पहुँचाते हैं ; इसलिये ऐसे विद्या-गर्वियोंके पास जाना और अपने कामकी कुरददानी