वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २ )
और चौदहों भुवनोंमें व्याप रहा है, जो पहले भी था, अब भी है और आगे आनेवाले समयमें भी रहेगा, इसलिये वह अनन्त है, उसका विनाश नहीं है, वह चैतन्य स्वरूप है, वह केवल अपने ही अनुभवसे जाना जा सकता है, वह परम शान्त और तेजोरूप है, उसीको मैं वन्दना करता हूँ ।
1. To One unlimited by time or space, to the Boundless, to Him who is all consciousness, to one who is know-able only by self-contemplation and to the Supreme Peace and Light I bow down in prayer.
बोद्धारो मत्सरधन्ताः प्रभवः स्मयद्भूषिताः ।
अबोयोपहताश्चान्ये जीर्णर्मिगे सुभाषितम् ॥२॥
जो विद्वान् हैं, वे ईर्षासे भरे हुए हैं ; जो धनवान् हैं, उनके आपने धनका गर्व है ; इनके सिवा जो और लोग हैं, वे अज्ञानी हैं ; इसलिये विद्वत्तापूर्ण विचार, सुन्दर-सुन्दर सारगर्भित निबन्ध या उत्तम काव्य शरीरमें ही नाश हो जाते हैं ॥२॥
खुलासा ।
जो विद्वान् हैं, पण्डित हैं, जिन्हें अच्छे-बुरेका ज्ञान या तमीज है, वे तो अपनी विद्वत्ताके अभिमानसे मतवाले हो रहे हैं, वे दूसरोंके उत्तम-से-उत्तम कामोंमें छिद्रान्वेषण करने या नुकताचीनी करनेमें ही अपना पाण्डित्य समझते हैं ; अतः ऐसोंसे कुछ कहनेमें ठामको ज़रा भी सम्भावना नहीं ।