वैराग्य शतक

वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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॥ श्रीः ॥
भर्तृ हरिकृत
वैराग्य शतक
दिकालाद्यनवच्छिन्नाजन्तचिन्मात्रमूर्तये ।
स्वातुभूयैकमानाय नमः शान्ताय तेजसे ॥१॥
जो दशों दिशाओं और तीनों कालोंमें परिपूर्ण है, जो अनन्त है, जो चैतन्य-स्वरूप है, जो अपने ही अनुभवसे जाना जा सकता है, जो शान्त और तेजोमय है, ऐसे ब्रह्म रूप परमात्मा को मैं नमस्कार करता हूँ ॥१॥
जो परमेश्वर पूरब पच्छिम प्रभृति दशों दिशाओं एवं भूत, भविष्यत् और वर्तमान काल,—इनसे संकुचित नहीं है ; यानी जो सब दिशाओं और तीनों कालोंमें मौजूद रहता है, किसी दिशा और किसी कालको केंद्रमें नहीं है, जो तीनों लोक