भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( १४ )

यह जान-सुनकर, कि ज़मानमें धन है, मैंने ज़मीनको पैंहे तक खोद डाला, पर कुछ भी न मिला। रसायन सिद्ध करने या सोना-चाँदी बनानेके लिये, मैंने अनेक तरहकी धातुयें फूँक डालीं, पर रसायन न बनी। फिर मैंने यह जानकर, कि समुद्र रत्नोंको खान है—उसमें मोतियोंको इफ़्तरात है; मैं समुद्रमें भी घुसा और उसकी शाह ले आया, मगर कुछ हाथ न आया। फिर यह सोचकर, कि राजाओंकी सेवा करनेसे धन हाथ आता है; मैंने उनके सन्तुष्ट करनेकी भी भर-पूर चेष्टायें कीं; उन्हें सब तरह खुश किया, पर फिर भी धन हाथ न आया। शेषमें, मैंने मन्त्रसिद्धि करनी चाही, इसलिये मैं रात-रातभर अकेला मरघटमें मुर्दाके पास बैठकर मन्त्र जपता रहा, कि वशीकरण मन्त्र सिद्ध हो जाय और राजाओंको वश करके धन प्राप्त करूँ; पर यहाँ भी मुझे निराशाका ही सामना करना पड़ा। सारी चेष्टायें करनेपर भी एक फूटो कौड़ी न मिली! इसलिये हे तृष्णा! अब मैं निराश हो गया हूँ। मुझे सर्वत्र अन्धकार-ही-अन्धकार दीखता है। अब तो तू दया करके मेरा पीछा छोड़ दे !

इसका यही मतलब है कि, भाग्यके विरुद्ध चेष्टा करना बुथा है। जितना धन भाग्यमें लिखा है, उतना तो बिना कोशिश किये, बिना किसीको खुशामद किये, बिना देश-विदेश डोले, घर बैठे ही मिल जायगा। भाग्यके लिखेसे अधिक हज़ारों चेष्टायें करने पर भी न मिलेगा। सिकन्दर