वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 84, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( १५ )
अमृतके लिये अँधेरी दुनियामें गया ; पर अमृतके कुण्डके पास पहुँच जाने पर भी, वह अमृतको खव न सका ; क्योंकि उसके भाग्यमें अमृत न था। मूर्ख मनुष्य भाग्यपर सन्तोष नहीं करता ; धनके लिये मारा-मारा फिरता है। जब कुछ भी हाथ नहीं लगता, तब रोता और कलपता है। किसी कविने ठीक ही कहा है :—
कवित ।
जो कुछ विधाता तेरे लिख्यो ललाट-पाट,
ताही पर आपना आप अमल करले ।
सोनेका सुमेर भावे देख वार पर भीष्म,
घटै वंदै नहिं यह निश्चय जिय धारले ।
देवीदास कहै जोई होनहार सोई हवै है,
मनमें विचार रैन दिन अनुसर ले ।
वापी कूप सरिता भरे हैं सात सागर पै,
तू तो तेरे वासन-समान पानी भर ले ।
शिक्षा—हे मनुष्य ! यदि तू सुख-शान्तिसे जीवन यापन करना चाहता है, तो तृष्णा-विद्याचीके फन्देसे निकल कर भाग्य पर सन्तोष कर। सन्तोष के सिवा सुख-शान्ति लाभ करनेका और उपाय नहीं है। यदि सन्तोष न करेगा, तो तृष्णाके सारे भटक-भटक कर दारो उग्र बाँहों रँवा देगा, और अन्तमें कुछ हाथ भी न खींचेगा।