भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( १५ )

अमृतके लिये अँधेरी दुनियामें गया ; पर अमृतके कुण्डके पास पहुँच जाने पर भी, वह अमृतको खव न सका ; क्योंकि उसके भाग्यमें अमृत न था। मूर्ख मनुष्य भाग्यपर सन्तोष नहीं करता ; धनके लिये मारा-मारा फिरता है। जब कुछ भी हाथ नहीं लगता, तब रोता और कलपता है। किसी कविने ठीक ही कहा है :—

कवित ।

जो कुछ विधाता तेरे लिख्यो ललाट-पाट,

ताही पर आपना आप अमल करले ।

सोनेका सुमेर भावे देख वार पर भीष्म,

घटै वंदै नहिं यह निश्चय जिय धारले ।

देवीदास कहै जोई होनहार सोई हवै है,

मनमें विचार रैन दिन अनुसर ले ।

वापी कूप सरिता भरे हैं सात सागर पै,

तू तो तेरे वासन-समान पानी भर ले ।

शिक्षा—हे मनुष्य ! यदि तू सुख-शान्तिसे जीवन यापन करना चाहता है, तो तृष्णा-विद्याचीके फन्देसे निकल कर भाग्य पर सन्तोष कर। सन्तोष के सिवा सुख-शान्ति लाभ करनेका और उपाय नहीं है। यदि सन्तोष न करेगा, तो तृष्णाके सारे भटक-भटक कर दारो उग्र बाँहों रँवा देगा, और अन्तमें कुछ हाथ भी न खींचेगा।