भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

( १५ )

अमृतके लिये अँधेरी दुनियामें गया ; पर अमृतके कुण्डके पास पहुँच जाने पर भी, वह अमृतको खव न सका ; क्योंकि उसके भाग्यमें अमृत न था। मूर्ख मनुष्य भाग्यपर सन्तोष नहीं करता ; धनके लिये मारा-मारा फिरता है। जब कुछ भी हाथ नहीं लगता, तब रोता और कलपता है। किसी कविने ठीक ही कहा है :—

कवित ।

जो कुछ विधाता तेरे लिख्यो ललाट-पाट,

ताही पर आपना आप अमल करले ।

सोनेका सुमेर भावे देख वार पर भीष्म,

घटै वंदै नहिं यह निश्चय जिय धारले ।

देवीदास कहै जोई होनहार सोई हवै है,

मनमें विचार रैन दिन अनुसर ले ।

वापी कूप सरिता भरे हैं सात सागर पै,

तू तो तेरे वासन-समान पानी भर ले ।

शिक्षा—हे मनुष्य ! यदि तू सुख-शान्तिसे जीवन यापन करना चाहता है, तो तृष्णा-विद्याचीके फन्देसे निकल कर भाग्य पर सन्तोष कर। सन्तोष के सिवा सुख-शान्ति लाभ करनेका और उपाय नहीं है। यदि सन्तोष न करेगा, तो तृष्णाके सारे भटक-भटक कर दारो उग्र बाँहों रँवा देगा, और अन्तमें कुछ हाथ भी न खींचेगा।

( १६ )

कल्पय ।

खोदत डोल्यो भूमि, गडीहु न पाई सम्पति ।

घोंकत रह्यो पखान, कनकके लोभ लगी मति ॥

गयो सिन्दुके पास, तहाँ सुक्ताहु न पायो ।

कौड़ी कर नहीं लगी, नृपनको शीश नवायो ॥

साधे प्रयोग रमशानमें, भूत व्रेत बैताल सजि ।

कितहूँ भयो न बाँझित कङ्ख, अब तो तृष्णा मोहि तजि ॥४

4. I dug up the surface of the earth in search of treasure, burnt down various minerals in my hankering after alchemy, explored the ocean in search of pearls or in my greed after trade, tried my best to please the kings, and spent the whole nights in lonely cremation grounds reproducing chants with an all attentive mind, but it is a pity that I have gained not a single broken cowrie although I did all this. Do thou, O Greed, now leave me !

आनन्त देशमनेकदुर्गविषमं प्राप्तं न किञ्चित्फलं

त्यक्त्वा जानिकुलाभिमानमुचितं सेवां कृता निष्फलम् ॥

भुक्तं मानविवर्जितं परशुहैष्वाशंकया काकव-

त्तुष्णो दुर्भतिपापकर्मानिरते नाद्यापि संतुष्ट्यसि ॥५॥

मैं अनेक दुर्गम और कठिन स्थानोंमें डोलता फिरा, पर कुछ भी नतीजा न निकला । मैंने, अपनी जाति और अपने कुलका

( १७ )

अभिमान त्यागकर, पराई चाकरी भी की ; पर उससे भी कुछ न मिला । शेषमें, मैं कन्वेकी तरह डरता हुआ और अपमान सहता हुआ परायें घरोंके टुकड़े भी खाता फिरा । हे पाप-कर्म कराने वाली और कुमतिदायिनी तुम्झे ! क्या तुम्हे इतने पर भी सन्तोष नहीं हुआ ? ॥५॥

धनके लालचमें, मैं अपना देश और घर-द्वार छोड़कर ऐसे-ऐसे स्थानोंमें गया, जहाँ मनुष्य बड़ी कठिनाईसे पहुँच सकते हैं ; पर वहाँ जानेपर भी मुझे एक पाई न मिली । मैंने अपने द्विजत्व या ऊँची जातिके अभिमानको त्यागकर पराई नौकरी भी की और मालिकने जो-जो नीच कर्म कराये वही किये, लेकिन उससे भी मुझे धन न मिला । शेषमें, मैं मान-अपमान को छप्पर पर रखकर, बिना बुलाये ही लोगोंके घर गया और कन्वेकी तरह डरते-डरते खाता रहा । मुझे इन सब कामों से बड़ी ठेस लगी । मैंने अनेक प्रकारके कष्ट उठाये, मान खोया, लोगोंके कुवचन सहे, पर फिर भी मेरी कामना सिद्ध न हुई ! इसलिये कम्बल तृष्णा ! मैं तुफ़से पूछता हूँ कि, इतने कुकर्म करारकर भी तुम्हे सन्तोष हुआ या नहीं ?

छप्पय ।

भटको देश-विदेश, तहाँ फल कछुहू न पायो ।

निज कुलको अभिमान छोड़, सेवा चित लायो ॥

( १८ )

सहि गारी अरु खीफ, हाथ फारत घर आयो ।

दूर करत हूँ दौरि, स्वान-जिभि परग्रह खायो ॥

इहि भौति नवायो मोहि तैं, बहकायो दै लोभतल ।

अबहूँ न तोहि सन्तोष कहु, नृप्या ! तू पापिन प्रबल ॥५॥

5. I roamed about many difficult and impassable lands but it was all fruitless. I served others forsaking the reasonable pride of my tribe and family but it was of no use. I even dined in other people's houses where no respect was shown to me and where I had always been in suspense like a crow. Art thou not O evil natured Avarice, even now satisfied with having perpetrated so many misdeeds ?

खलोछापाः सोढाः कथमपि तदाराधनपरै-

निगृह्यान्तर्बाधं हसितमपिशून्येन मनसा ॥

कृतथितस्तम्भः प्रहसितथियामञ्जलिरपि

त्वआशे मोयाशे किमपरमते नर्यसि माध ॥ ६ ॥

मैंने दुष्टोंकी सेवा करते हुए उनकी तानेजनी और ठडेवाजी सही, भीतरके दुःखसे आये हुए और रोक और उद्दिष्ट चित्तसे उनके सामने हँसता रहा । उन हँसनेवालोंके सामने, चित्तको स्थिर करके, हाथ भी जोड़े । हे सूठी आशा ! क्या अभी और भी नाच नचायेगी ? ॥६॥

मैंने नीवोंको नौकरी करली । उनकी सेवा करते हुए मैंने

( १६ )

उन दुष्टोंके अवाजे-तवाजे, गाली-गठौज और दिल्ली सभी कुछ बर्दाश्त की। उनके वाग्वाणीसे मेरे कलेजमें छेद हो जाते थे और हृदय रोने लगता था। उसके कारणसे जो आँसू आते थे, उन्हें मैं रोक लेता था। भीतरसे मेरा दिल एकदम मुर्खा गया था, पर फिर भी मैं उनके सामने हँसा करता और कोधको दबाकर और विचको स्थिर और शान्त करके उन मसखरोंको मैंने हाथ भी जोड़े; पर फिर भी उनसे मुझे कुछ न मिला! हे आशा! निष्फल! आशा! इतने नाच तो नचाये, अब और तेरे दिलमें क्या है?

छप्पय।

सहे खलनके बैन इतै, पर तिनहिं रिझाये।

नैननको जल रोक, शून्य मन मुख सुसक्याये ॥

देत नहीं कछु विच, तज कर जोर दिखाये।

कर कर चाव करोर, मोरही दौरत घाये ॥

सुनि घ्रास! प्यास तेरी प्रबल, तू अति अदुभुत गति रहत।

इहि भौति नचायो मोहि, अब और कहा करिबो चहत? ॥६॥

6, I tolerated the jokes of evil-minded persons some how or other in my efforts to please them and while trying to stop my tears, I smiled at heart with an extremely desolate heart and even clasped my hands in feigned satisfaction before these sneering per-

( २० )

sons while trying hard to control the indignation of my heart. Wilt thou, O delusive Hope, make me dance still further ?

आदित्यस्य गतागतैरहरः संचीयते जीवितं व्यापारैर्वैदुकार्यभारगुरुभिः कालो न विज्ञायते ॥ दृष्ट्वा जनमजराविपत्तिमर्यां त्रासश्च नोत्पद्यते पीत्वा मोहमर्थो प्रमादमदिरामुन्मत्तभूतं जगत् ॥७॥

सूर्यके उदय और अस्तके साथ मनुष्योंकी जिन्दगी राज घटती जाती है। समय भागा जाता है, पर कारोबारमें मशगूल रहनेके कारण, वह भागता डुब्रा नहीं दीखता। लोगोंको पैदा होते, बूढ़े होते, विपत्ति-प्रसित होते और मरते देखकर भी मनमें भय नहीं होता। इससे मालूम होता है कि, मोहमयी प्रमादरूपी मदिरा (शराब) के नशेमें संसार मतवाला हो रहा है ॥७॥

देखते हैं, रोज ही सूर्य उदय होते हैं और अस्त होते हैं। रोज ही सवेरा होता है और रोज ही सन्ध्या होती है। सूर्यके उदयास्तके साथ-ही-साथ मनुष्योंकी आयु क्षीण होती जाती है; याना उम्र घटती जाती है। किसीने क्या खूब कहा है—

सुबह होती है शाम होती है ।

यौही उम्र तमास होती है ॥

और भी खुलासा ।

( २१ )

रोज़ सबेरा होता है और साँझ होती है; इस तरह नित्य हमारी आयु कम होती जा रही है। विचारकर देखने से बड़ा विस्मय होता है कि, दिन और रात कैसी तेज़ीसे होते चले जाते हैं। जिनको कोई काम नहीं है अथवा जो दुःखिया हैं, उन्हें तो ये बड़े भारी मालूम होते हैं, काटे नहीं कटते—एक-एक क्षण एक-एक वर्षके बराबर बीतता है; पर जो कारोबार या नौकरी-चाकरीमें लगे हुए हैं, उनका समय हवासे भी अधिक तेज़ीसे उड़ा चला जाता है, यानी कारोबार या धन्येमें लगे रहनेके कारण उन्हें मालूम नहीं होता। वे अपने कामोंमें भूलें रहते हैं और मृत्युकाल तेज़ीसे नज़दीक आता जाता है। जिस तरह डाक गाड़ीमें बैठने वाला यात्री अगर अकेला और उदासबित्त रहता है, तो उसके सफ़रका समय बड़ी कठिनाईसे बीतता है; पर यदि उसके साथ दो-चार मित्र या स्त्री-पुत्र प्रभृति होते हैं और वे उस गाड़ीमें हँसते-बोलते, खाते-पीते या आनन्द करने लगते हैं, आपसमें मनोरञ्जक कथा-वार्ता करते हैं, तो वह लोग तो आनन्दमें मग्न रहते हैं, और गाड़ी अपनी पूरी तेज़ीसे चली जाती है, उन्हें यह भी नहीं मालूम होता कि, कितनी राह तय हो गयी। जब सुनते हैं कि, देहली आ गयी, तब उन्हें विस्मयसा होता है; इसी तरह कारोबारमें लगे हुए लोगोंको मालूम नहीं होता और समय हवासे भी अधिक तेज़ीसे उड़ा चला जाता है और अन्तमें उनका अन्त करने वाला काल आ जाता है।

[ ( २२ ) ]

मनुष्य नित्य आँखोंसे देखता है कि, आज फलों मनुष्य चल बसा ; आज अमुक आदमी जो जवानीमें ऐश आराम करता था, घोड़े गाड़ियों पर चढ़ कर चलता था, बुढ़ा हो गया है ; उसकी जवानी, उसकी सुन्दरता न जाने कहाँ विलीन हो गयी है । अमुक आदमी जो करोड़पति था, जिसके यहाँ सैंकड़ों दास-दासी थे, जिसके सामने हीरे पनने और सोने चाँदीके ढेर लगे रहते थे, स्वयम् भिखारी हो गया है ; राजाने उसे जेलमें बन्द कर दिया है और उसके खो-पुत्र उसकी खबर भी नहीं लेते । नित्य मरण, जीवन, बुढ़ापा और विपत्ति देख कर भी मनुष्यके मनमें भय नहीं होता । वह दूसरोंको बुढ़ा हुआ देखता है, पर आप यही समझता है कि, मैं तो सदा जवान बना रहूँगा । अपने मित्र और नातेदारों को सर्वस्व छोड़कर मरते देखता है, पर आप समझता है कि, वे मर गये तो मर गये, मैं न मरूँगा । दूसरों पर विपत्ति पड़ी देखता है, पर इतना नहीं समझता कि, मुझ पर भी किसी दिन ऐसी ही विपद् आ सकती है । बहुतोंको श्मशान पर जाकर वैराग्य होता है, पर वह क्षण-भर ही टिकता है । स्नान करके घर आते ही याद भूलने लगती है और मनुष्य अपने धन्योमें लगकर तो बिल्कुल ही भूल जाता है । मनुष्य इतनी ग़फ़लत क्यों करता है ? इस ग़फ़लत और बेहोशी का कारण मोहमयी मदिरा है, जिसे पीकर संसार मतवाला हो रहा है ; क्योंकि मनुष्यको औरोंको बूढ़े होते और मरते देखकर भी चेत नहीं होता । इतना ही नहीं, अपनी कायामें रोग

[ २३ ]

और बुढ़ापा प्रभृति देखकर भी उसे जीने और सुख भोगनेकी आशा बनी रहती है । वह उसी आशाके सहारे लटकता हुआ अपना जीवन नष्ट करता है और उधर काल अपनी कतरनीसे उसकी जीवन-डोरीको काटता रहता है । शंकराचार्यजीने “मोहमुद्गर” में कहा है—

दिन यामिन्यौ सायं प्रातः,

शिशिर वसन्तौ पुनरायातः ।

कालः क्रीडति गच्छत्याशुः,

तदपि न मुञ्चत्याशावाशुः ॥

दिन-रात, सवेरे-साँझ, शीत और वसन्त आते और जाते हैं, काल क्रीड़ा करता है, जीवनकाल चला जाता है ; तोभी संसार आशाको नहीं छोड़ता ।

शिक्षा—मनुष्यो ! मिथ्या आशाके फेरमें दुर्लभ मनुष्य-देहको योंही नष्ट न करो । देखो, सिर पर काल नाच रहा है ; एक साँसका भी भरोसा न करो । जो साँस बाहर निकल गया है, वह वापस आवे या न आवे । इसलिये गफ़लत और बेहोशी छोड़कर, अपनी कार्योंको ज़रूरीभंगुर समझकर, दूसरोंकी भलाई करो और अपने सिरजनहारमें मन लगाओ ; क्योंकि नाता उसीका सच्चा है ; और सब नाते झूठे हैं । कहा है :—

माया संगी न मन सगो, सगो न यह संसार ।

परशुराम या जीवको, सगो सो सिरजनहार ॥

[ २४ ]

छप्पय ।

च उदैं अस्त रवि होत, आयुको क्षीन करत नित । क यह-धन्ये के माहिँ, समय वीतत अजान चित । हे आखिन देखत, जन्म जरा अरु विपति मरण नित । ग तज डरत नहिँ नैक, शंकडु नाहिँ करत चित । द जग जीव मोह-मदिरा पिये, झाके फिरत प्रमादमें । ल गिरपरत उठत फिर फिर गिरत, विषय-वासना स्वादमें ॥७॥

नि 7. Along with the rising and setting of the sun, one's life is म being daily exhausted. The Flight of Time is not perceived owing द to the heavy transaction of business absorbing all attention. O even अ the phenomena of birth, old age, distress and death do not strike पर terror into heart of man. It seems the head of the world has been turned by drinking the intoxicating wine of carelessness.

दू दीना दीनमुखैः सदैव शिशुकैराच्छजीर्णाम्बरा वि कोशद्विः क्षुधितैर्नरेन विधुरा दृश्येत चेदेहिनी ॥ व याच्चाभंगभयेन गङ्गदङ्गललुट्यद्विलीनाचारं हो को देहीति वदेत्स्वदण्डजठरस्यार्थं मनस्वी जनः ॥८॥

म स्त्रीके फटे हुए कपडोंको दीनातिदीन बालक खाँचते हैं, घरके क और मनुष्य भूखके मारे उसके सामने रोते हैं—इससे स्त्री अतीव रह दुःखित है । ऐसी दुःखिनी स्त्री यदि घरमें न होती, तो कौन धीर भो

संवाचशतक २४६

राशे के दुकानके लिये बसे खीका कपड़ा खींच रहे हैं। तुम शयनका देखकर पुरुषके दिलमें कौनो बदमा हो रही है। मंगल में भी ही सब दुःखोंकी कारण है।

पृ० २४४

This image shows a blank, aged page, likely from a book or document. The page is off-white with visible signs of wear, including small dark spots and a vertical line of dark marks along the right edge, possibly from binding or scanning artifacts. The left and bottom edges are framed by dark borders, suggesting the page is part of a bound volume.

[ २५ ]

पुरुष, जिसका गला माँगनेके अपमान और इनकारके मयसे रक्ता जाता है, अस्पृष्ट भाषा या टूटे-फूटे शब्दोंमें, गिड़-गिड़ा कर “कुछ दीजिये” इन शब्दोंको, अपने पेटकी ज्वाला शान्त करनेके लिये, कहता ? ॥८॥

यदि किसीके घरमें पेसी दुखिया ली न हो, जिसके फटे हुए कपड़ोंको दीनातिदीन बरन्चे खींच रहे हों और जो घरके दूसरे मनुष्योंके अन्नके लिये रोनेसे दुःखित हो ; तो कौन और पुरुष है, जो अपना पेट भरनेके लिये, याचना-भङ्ग होनेके मयसे, टूटे-फूटे शब्दोंमें गिड़-गिड़ाकर “दीजिये” शब्द कहे ?

मतलब यह है, कि लीके कारणसे ही पुरुषको तरह-तरहके कष्ट उठाने और अपमान सहने पड़ते हैं ; इस लिये ली-पुत्र प्रभृति दुःखके कारण हैं। जब दग्दितामें खानेको अन्न नहीं होता, बालक माँके कपड़े पकड़-पकड़कर खींचते और रोटी माँगते हैं, तब वह बेचारी एकदमसे दुःखित हो जाती है। उसके मलिन चेहरेको देखकर पुरुष, अपने मानापमानका खयाल छोड़कर, भोख तक माँगने पर उतारू हो जाता है। उस समय, इस ढरसे कि कहीं मुझे कोई भिक्षा देनेसे नाहीं न करदे, पुरुषका गला घुटता है ; पर बेचारा लड़खड़ाती ज़बानसे “कुछ मुझे दीजिये” शब्द कहता ही है। यदि स्त्रो न होती, तो कौन पुरुष अपने पेटकी ज्वाला शान्त करनेके लिये ऐसा करता ?

[ २६ ]

संसारमें परसे माँगनेके समान मनुष्यका मान नाश करानेवाली दूसरी बात नहीं है। माँगना और मरना दोनों समान हैं। किसी-किसीका तो यह मत है कि, माँगनेसे मरना भला। याचना करनेसे त्रिलोकीनाथ भगवान्को भी छोटा होना पड़ा, तब औरोंकी कौन बात है? इसीलिये तुलसी-दासजीने कहा है—

तुलसी कर पर कर करो, कर तर कर न करो ।

जा दिन कर तर कर करो, ता दिन मरण करो ॥

हाथके ऊपर हाथ करो, पर हाथके नीचे हाथ न करो, जिस दिन हाथके नीचे हाथ करो, उस दिन मरण करो; यानी दूसरोंको दो, पर दूसरोंके आगे हाथ न फैलाओ। जिस दिन दूसरोंके आगे हाथ फैलानेको नौबत आवे, उस दिन मरण हो जाय तो भला।

दरिद्रतामें माँगनेकी बात कष्ट तक आती है; फिर बड़ी-बड़ी तकलीफोंसे किसी तरह ज़बान तक आती है; पर ज़बान पर ताळे लग जाते हैं; अतः वहाँ से आगे नहीं निकलती। प्राणोंकी बाज़ी लगाने पर भी, महत् पुरुषोंकी ज़बान से “कुछ दो” ये शब्द नहीं निकलते; पर स्त्रीके लिये बड़े-बड़ोंको भी नीचा देखना ही पड़ता है। अगर स्त्री न होती, तो महत् पुरुष अपने पापी पेटके लिये कभी किसीसे याचना न करत; अतः स्त्री ही सब दुःखोंकी मूल है। इस स्त्रीके लिये

( २७ )

पुरुष क्या-क्या कष्ट नहीं भोगता ? स्त्री-पुरुषोंके पालन-पोषण की चिन्तामें उसकी सारी आयु बीत जाती है ; पर परमात्माके भजनमें उसका मन नहीं लगता ! मन तो तब लगे, जबकि वह शुद्ध हो । उसे तो हरदम नोन-तेल लकड़ी और आटे दालकी चिन्ता लगी रहती है । ईश्वरमें मन न लगने और शेष दिन आ जानेसे, उसे फिर जन्म-मरणके झुंझरोंमें फँसना होता है । अतः जो लोग संसारमें सुख-शान्तिसे जीवन बिताना और मरने पर फिर संसारमें न आना चाहें, वे खी रूपी माया की केंद्रमें न पड़े । यह खी-माया ही संसार-वृक्षका बीज है । शब्द, स्पर्श, रस, रूप और गन्ध उसके पत्ते ; काम क्रोधादि उसकी डालियाँ और पुत्र-कन्या प्रभृति उसके फल हैं । तृष्णारूपी जलसे यह संसार-वृक्ष बढ़ता है । स्पष्ट है कि, संसार-बन्धनका कारण नारी ही है । जिसने नारीसे नाता नहीं जोड़ा अथवा जिसने खीको त्याग दिया, वह सच्चा संसारत्यागी है । उसे दुःख कहाँ ? वह निश्चय ही मोक्ष पावेगा । पर जो इस पिशाचीके फन्देमें फँस गया, उसे सुख कहाँ ? वह न इस जन्ममें सुख पा सकता है और न पर जन्ममें ही । संसारबन्धनसे मुक्त होनेमें “कनक और कामिनी” ये दो ही बाधक हैं । कहा है :—

चलूं-चलूं सब कोई कहै, पहुँचे विरला कोय । एक कनक और कामिनी, दुर्लभ घाटी देय ॥

( २८ )

एक कलक और कामिनी, ये लम्बी तरवारि । ताले थे हरिमिलन को, बिचही लीने मारि ॥ नारि नसावैं तीन सुख, जेहि नर पसे होय । भक्ति-मुक्ति अरु ज्ञानमें, पैठ सके ना कोय ॥

एक बार व्यासजीने शुक्रदेवजीसे शादी करनेको कहा । व्यासजीने समझानेमें घाटा न रखा, पर शुक्रदेवजीने एक न मानी । उन्होंने कहा—“पिता जी ! लोह और काठकी बेड़ियोंसे चाहे कभी छुटकारा हो जाय ; पर खी-पुत्र प्रभुतिकी मोहरूपी बेड़ियोंसे पुरुषका पीछा नहीं छूट सकता । है पिता, गृहस्थाश्रम जेलखाना है ; इसमें ज़रा भी सुख नहीं । खीके लिये पुरुषको संसारमें नीचे-से-नीचे काम करने पड़ते हैं । जिनके मुँह देखनेसे पाप लगता है, उनको खुशामदें करनी पड़ती है ; इसवास्ते मैं खीके बन्धनमें नहीं पड़ना चाहता ।”

छप्पय ।

फट्यो पुरानो चौर, ताहि खेंचत अरु फारत । छोटे-छोटे बाल, दुःख-ही-दुःख पुकारत । घरमाहीं नहि अब, नारिहु निर्दय याते । भई महा जड़रूप, करत सुखतों नहि बातें ।

( २६ )

यह दशा देखि अस्वस्त चित, जीव थरथरत रुकत सुख ।

अपने सुजरे या उदरहित, “देह”, कहै को सतपुरष ?॥८॥

8. If one had not to see the distressed face of a housewife, wearing worn out clothes, the skirts of which are continually being drawn by miserable looking children and who has to feel the agony of listening to the cries of hunger-stricken members of her family, who having a sense of self-respect would utter, for the satisfaction of his own hunger, the word “Give” spoken in a faltering tone, owing to his throat being choked by the fullness of his heart, in fear of his appeal for charity being refused.

निवृत्ता भोगेच्छा पुरुषबहुमानो विगलितः

समानाः स्वर्घाताः सपदि सुहृदो जीवितसमाः ॥

शनैर्षष्ठ्योत्थानं घनतिभिरुद्धे च नयने

अहो धृष्टः कायस्तदपि मरणापायचकितः ॥९॥

बुद्धापेके मारे भोग भोगनेकी इच्छा नहीं रही ; मान भी घट गया ; हमारी बराबर वाले चल बसे ; जो घनिष्ठ मित्र रह गये हैं, वे भी निकम्मे या हम जैसे हो गये हैं । अब हम बिना लकड़ीके उठ भी नहीं सकते और आँखोंमें आँखेरी छा गई है । इतना सब होनेपर भी, हमारी काया कैसी बेहया है, जो अपने मरनेकी बात सुनकर चौंक उठती है ! ॥९॥

शुष्ठासा यह है, कि हमारी जवानी चली गयी है ; वह

( ३० )

जोशखरोश और चटक-मटक अब नहीं रही है ; बुढ़ापेका दौरदौरा हो गया है ; गालोंमें खड्ड हो गये हैं ; वदनपर झुर्रियाँ पड़ गयी हैं ; सिरके बाल सफेद हो गये हैं ; दाँतोंने जवाब दे दिया है ;—यह तो हमारी दशा हो गयी है। लोगोंमें जो हमारा आदरमान था, अब वह भी घट रहा है। अब लोग हमें निकम्मा बूढ़ा समझकर घुणाकी दृष्टिसे देखते हैं। हमारी उम्रके लोग हमारे देखते-देखते चल बसे। जो रह गये हैं, वे भी हम जैसे निकम्मे हैं। अब हम ऐसे कमज़ोर हो गये हैं, कि बिना लकड़ी टेके चल भी नहीं सकते। आँखोंसे सूक्ष्मता नहीं। इतने पर भी, हमारी काया मरनेके नामसे काँप उठती है ! जीवनके मोहकी अजब हालत है !!

जगत्को विचित्र गति है ! इस जीवनमें जरा भी सुख नहीं है। मनुष्यके मित्र और नातेदार मर जाते हैं, आप निकम्मा हो जाता है, आँख-कान प्रभुति इन्द्रियाँ बेकाम हो जाती हैं, आँखोंसे सूक्ष्मता नहीं और कानोंसे सुनाई नहीं देता, घर-बाहरके लोग अनादर करते हैं, बुढ़ापेके मारे चला-फिरा नहीं जाता, खानेको भी कठिनाईसे मिलता है ; तोभी मनुष्य मरना नहीं चाहता, बल्कि मरनेकी बात सुनकर चौंक उठता है। इसे मोह न कहें तो क्या कहें ?

लकड़हारा और मौत ।

एक वृद्ध अतीव निर्धन था । बेदे-पोते सभी मर गये थे ।

( ३१ )

एक मात्र बुढ़िया रह गयी थी। बूढ़ेके हाथ-पैरोंने जवाब दे दिया था। आँखोंसे दीखता न था। फिर भी ; अपने और बूढ़ी के पेटके लिये, वह जड़लसे लकड़ी काटकर लाता और बेचकर गुज़ारा करता था। एक दिन उसने जीवनसे निहायत दुःखी होकर मौतको पुकारा। उसके पुकारते ही मौत मनुष्य-रूप में उसके सामने आ खड़ी हुई। बूढ़ेने पूछा—“तुम कौन हो?” उसने कहा—“मैं मृत्यु हूँ, तुम्हें लेने आई हूँ।” मौतका नाम सुनते ही लकड़हारा चौँक उठा और कहने लगा—“मैंने आपको यह भारी उखानेको बुलाया था।” मौत उसकी भारी उखवा कर चली गयी।

देखिये ! बूढ़ा लकड़हारा हर तरह दुःखी था, उसे जीवन में जरा भी सुख न था ; फिर भी वह मरता न चाहता था ; बल्कि मौत को देखते ही चौँक पड़ा था। यही गति संसार की है।

एक दुःखित बूढ़ा सेठ ।

एक वैश्यने उग्र-भर भर-पचकर खूब धन जमा किया। बुढ़ापेमें पुत्रोंने सारे धन पर कबज़ा कर, बूढ़ेको पौलीमें एक टूटी सी खाट और फटोसी गुदड़ों पर डाल दिया और कुत्ता मारनेके लिये हाथमें लकड़ी दे दी। सुबह-शाम घरका कोई आदमी बचा-खुचा बासी-कूसी उसे खानेको दे जाता। सेठ बड़े दुःखसे अपनी जिन्दगी पार करता था। पुत्र-बध्रपं दिन-भर

( ३२ )

कहा करती थीं—“यह भर नहीं जाते। सबको मौत आती है, पर इनको मौत नहीं। दिन-भर पौलीमें थूक-थूककर मैला करते हैं।” एक दिन एक पोता उन्हें पीट रहा था। इतनेमें नारदजी आ निकले। उन्होंने सारा हाल देख कर कहा—“सेठजी ! आप बड़े दुःखी हैं। स्वर्गमें कुछ आदमियों की ज़रूरत है। अगर तुम चलो तो हम ले चले।” सुनतेही सेठ ने कहा—“जारे वैरागीड़ा ! मेरे बेटे-पोते मुझे मारते हैं वाहे गालो देते हैं तुझे क्या ? तू क्या हमारा पंच है ? मैं इन्हींमें सुखी हूँ। मुझे स्वर्गकी ज़रूरत नहीं।” सेठकी बातें सुनते ही नारदजी को बड़ा आश्चर्य हुआ। कहने लगे—“ओह ! संसार सबमुच ही मोह-पाशमें फँसा है। मोहकी मदिराके मारे इसे होश नहीं। मनुष्यने क्रममें पैर लटकवा रखे हैं ; फिर भी विषयोंमें ही उसका मन लगा है।” किसीने ठीक ही कहा है :—

गतं तत्तारुण्यं तत्क्षणिहृदयानन्दजनकं, विशीर्णा दन्तालिनिजगतिरहो यश्चिरणं । जहीभूता दृष्टिः श्रवणरहितं कर्णसुगलं, मनोमे निर्लज्जं तदपि विषयेभ्यःस्पृहयति ॥

तत्क्षणिके हृदयमें आनन्द पैदा करवाली जवानी चली गई है, दन्तपत्तिके गिर गयी हैं, लकड़ीका सहारा लेकर चलता हूँ, नेत्र ज्योति