वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २७ )
पुरुष क्या-क्या कष्ट नहीं भोगता ? स्त्री-पुरुषोंके पालन-पोषण की चिन्तामें उसकी सारी आयु बीत जाती है ; पर परमात्माके भजनमें उसका मन नहीं लगता ! मन तो तब लगे, जबकि वह शुद्ध हो । उसे तो हरदम नोन-तेल लकड़ी और आटे दालकी चिन्ता लगी रहती है । ईश्वरमें मन न लगने और शेष दिन आ जानेसे, उसे फिर जन्म-मरणके झुंझरोंमें फँसना होता है । अतः जो लोग संसारमें सुख-शान्तिसे जीवन बिताना और मरने पर फिर संसारमें न आना चाहें, वे खी रूपी माया की केंद्रमें न पड़े । यह खी-माया ही संसार-वृक्षका बीज है । शब्द, स्पर्श, रस, रूप और गन्ध उसके पत्ते ; काम क्रोधादि उसकी डालियाँ और पुत्र-कन्या प्रभृति उसके फल हैं । तृष्णारूपी जलसे यह संसार-वृक्ष बढ़ता है । स्पष्ट है कि, संसार-बन्धनका कारण नारी ही है । जिसने नारीसे नाता नहीं जोड़ा अथवा जिसने खीको त्याग दिया, वह सच्चा संसारत्यागी है । उसे दुःख कहाँ ? वह निश्चय ही मोक्ष पावेगा । पर जो इस पिशाचीके फन्देमें फँस गया, उसे सुख कहाँ ? वह न इस जन्ममें सुख पा सकता है और न पर जन्ममें ही । संसारबन्धनसे मुक्त होनेमें “कनक और कामिनी” ये दो ही बाधक हैं । कहा है :—
चलूं-चलूं सब कोई कहै, पहुँचे विरला कोय । एक कनक और कामिनी, दुर्लभ घाटी देय ॥