भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 97

[ २६ ]

संसारमें परसे माँगनेके समान मनुष्यका मान नाश करानेवाली दूसरी बात नहीं है। माँगना और मरना दोनों समान हैं। किसी-किसीका तो यह मत है कि, माँगनेसे मरना भला। याचना करनेसे त्रिलोकीनाथ भगवान्को भी छोटा होना पड़ा, तब औरोंकी कौन बात है? इसीलिये तुलसी-दासजीने कहा है—

तुलसी कर पर कर करो, कर तर कर न करो ।

जा दिन कर तर कर करो, ता दिन मरण करो ॥

हाथके ऊपर हाथ करो, पर हाथके नीचे हाथ न करो, जिस दिन हाथके नीचे हाथ करो, उस दिन मरण करो; यानी दूसरोंको दो, पर दूसरोंके आगे हाथ न फैलाओ। जिस दिन दूसरोंके आगे हाथ फैलानेको नौबत आवे, उस दिन मरण हो जाय तो भला।

दरिद्रतामें माँगनेकी बात कष्ट तक आती है; फिर बड़ी-बड़ी तकलीफोंसे किसी तरह ज़बान तक आती है; पर ज़बान पर ताळे लग जाते हैं; अतः वहाँ से आगे नहीं निकलती। प्राणोंकी बाज़ी लगाने पर भी, महत् पुरुषोंकी ज़बान से “कुछ दो” ये शब्द नहीं निकलते; पर स्त्रीके लिये बड़े-बड़ोंको भी नीचा देखना ही पड़ता है। अगर स्त्री न होती, तो महत् पुरुष अपने पापी पेटके लिये कभी किसीसे याचना न करत; अतः स्त्री ही सब दुःखोंकी मूल है। इस स्त्रीके लिये