भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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पुरुष, जिसका गला माँगनेके अपमान और इनकारके मयसे रक्ता जाता है, अस्पृष्ट भाषा या टूटे-फूटे शब्दोंमें, गिड़-गिड़ा कर “कुछ दीजिये” इन शब्दोंको, अपने पेटकी ज्वाला शान्त करनेके लिये, कहता ? ॥८॥

यदि किसीके घरमें पेसी दुखिया ली न हो, जिसके फटे हुए कपड़ोंको दीनातिदीन बरन्चे खींच रहे हों और जो घरके दूसरे मनुष्योंके अन्नके लिये रोनेसे दुःखित हो ; तो कौन और पुरुष है, जो अपना पेट भरनेके लिये, याचना-भङ्ग होनेके मयसे, टूटे-फूटे शब्दोंमें गिड़-गिड़ाकर “दीजिये” शब्द कहे ?

मतलब यह है, कि लीके कारणसे ही पुरुषको तरह-तरहके कष्ट उठाने और अपमान सहने पड़ते हैं ; इस लिये ली-पुत्र प्रभृति दुःखके कारण हैं। जब दग्दितामें खानेको अन्न नहीं होता, बालक माँके कपड़े पकड़-पकड़कर खींचते और रोटी माँगते हैं, तब वह बेचारी एकदमसे दुःखित हो जाती है। उसके मलिन चेहरेको देखकर पुरुष, अपने मानापमानका खयाल छोड़कर, भोख तक माँगने पर उतारू हो जाता है। उस समय, इस ढरसे कि कहीं मुझे कोई भिक्षा देनेसे नाहीं न करदे, पुरुषका गला घुटता है ; पर बेचारा लड़खड़ाती ज़बानसे “कुछ मुझे दीजिये” शब्द कहता ही है। यदि स्त्रो न होती, तो कौन पुरुष अपने पेटकी ज्वाला शान्त करनेके लिये ऐसा करता ?