वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 99, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( २८ )
एक कलक और कामिनी, ये लम्बी तरवारि । ताले थे हरिमिलन को, बिचही लीने मारि ॥ नारि नसावैं तीन सुख, जेहि नर पसे होय । भक्ति-मुक्ति अरु ज्ञानमें, पैठ सके ना कोय ॥
एक बार व्यासजीने शुक्रदेवजीसे शादी करनेको कहा । व्यासजीने समझानेमें घाटा न रखा, पर शुक्रदेवजीने एक न मानी । उन्होंने कहा—“पिता जी ! लोह और काठकी बेड़ियोंसे चाहे कभी छुटकारा हो जाय ; पर खी-पुत्र प्रभुतिकी मोहरूपी बेड़ियोंसे पुरुषका पीछा नहीं छूट सकता । है पिता, गृहस्थाश्रम जेलखाना है ; इसमें ज़रा भी सुख नहीं । खीके लिये पुरुषको संसारमें नीचे-से-नीचे काम करने पड़ते हैं । जिनके मुँह देखनेसे पाप लगता है, उनको खुशामदें करनी पड़ती है ; इसवास्ते मैं खीके बन्धनमें नहीं पड़ना चाहता ।”
छप्पय ।
फट्यो पुरानो चौर, ताहि खेंचत अरु फारत । छोटे-छोटे बाल, दुःख-ही-दुःख पुकारत । घरमाहीं नहि अब, नारिहु निर्दय याते । भई महा जड़रूप, करत सुखतों नहि बातें ।