भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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जोशखरोश और चटक-मटक अब नहीं रही है ; बुढ़ापेका दौरदौरा हो गया है ; गालोंमें खड्ड हो गये हैं ; वदनपर झुर्रियाँ पड़ गयी हैं ; सिरके बाल सफेद हो गये हैं ; दाँतोंने जवाब दे दिया है ;—यह तो हमारी दशा हो गयी है। लोगोंमें जो हमारा आदरमान था, अब वह भी घट रहा है। अब लोग हमें निकम्मा बूढ़ा समझकर घुणाकी दृष्टिसे देखते हैं। हमारी उम्रके लोग हमारे देखते-देखते चल बसे। जो रह गये हैं, वे भी हम जैसे निकम्मे हैं। अब हम ऐसे कमज़ोर हो गये हैं, कि बिना लकड़ी टेके चल भी नहीं सकते। आँखोंसे सूक्ष्मता नहीं। इतने पर भी, हमारी काया मरनेके नामसे काँप उठती है ! जीवनके मोहकी अजब हालत है !!

जगत्को विचित्र गति है ! इस जीवनमें जरा भी सुख नहीं है। मनुष्यके मित्र और नातेदार मर जाते हैं, आप निकम्मा हो जाता है, आँख-कान प्रभुति इन्द्रियाँ बेकाम हो जाती हैं, आँखोंसे सूक्ष्मता नहीं और कानोंसे सुनाई नहीं देता, घर-बाहरके लोग अनादर करते हैं, बुढ़ापेके मारे चला-फिरा नहीं जाता, खानेको भी कठिनाईसे मिलता है ; तोभी मनुष्य मरना नहीं चाहता, बल्कि मरनेकी बात सुनकर चौंक उठता है। इसे मोह न कहें तो क्या कहें ?

लकड़हारा और मौत ।

एक वृद्ध अतीव निर्धन था । बेदे-पोते सभी मर गये थे ।