वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 102, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३१ )
एक मात्र बुढ़िया रह गयी थी। बूढ़ेके हाथ-पैरोंने जवाब दे दिया था। आँखोंसे दीखता न था। फिर भी ; अपने और बूढ़ी के पेटके लिये, वह जड़लसे लकड़ी काटकर लाता और बेचकर गुज़ारा करता था। एक दिन उसने जीवनसे निहायत दुःखी होकर मौतको पुकारा। उसके पुकारते ही मौत मनुष्य-रूप में उसके सामने आ खड़ी हुई। बूढ़ेने पूछा—“तुम कौन हो?” उसने कहा—“मैं मृत्यु हूँ, तुम्हें लेने आई हूँ।” मौतका नाम सुनते ही लकड़हारा चौँक उठा और कहने लगा—“मैंने आपको यह भारी उखानेको बुलाया था।” मौत उसकी भारी उखवा कर चली गयी।
देखिये ! बूढ़ा लकड़हारा हर तरह दुःखी था, उसे जीवन में जरा भी सुख न था ; फिर भी वह मरता न चाहता था ; बल्कि मौत को देखते ही चौँक पड़ा था। यही गति संसार की है।
एक दुःखित बूढ़ा सेठ ।
एक वैश्यने उग्र-भर भर-पचकर खूब धन जमा किया। बुढ़ापेमें पुत्रोंने सारे धन पर कबज़ा कर, बूढ़ेको पौलीमें एक टूटी सी खाट और फटोसी गुदड़ों पर डाल दिया और कुत्ता मारनेके लिये हाथमें लकड़ी दे दी। सुबह-शाम घरका कोई आदमी बचा-खुचा बासी-कूसी उसे खानेको दे जाता। सेठ बड़े दुःखसे अपनी जिन्दगी पार करता था। पुत्र-बध्रपं दिन-भर