भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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कहा करती थीं—“यह भर नहीं जाते। सबको मौत आती है, पर इनको मौत नहीं। दिन-भर पौलीमें थूक-थूककर मैला करते हैं।” एक दिन एक पोता उन्हें पीट रहा था। इतनेमें नारदजी आ निकले। उन्होंने सारा हाल देख कर कहा—“सेठजी ! आप बड़े दुःखी हैं। स्वर्गमें कुछ आदमियों की ज़रूरत है। अगर तुम चलो तो हम ले चले।” सुनतेही सेठ ने कहा—“जारे वैरागीड़ा ! मेरे बेटे-पोते मुझे मारते हैं वाहे गालो देते हैं तुझे क्या ? तू क्या हमारा पंच है ? मैं इन्हींमें सुखी हूँ। मुझे स्वर्गकी ज़रूरत नहीं।” सेठकी बातें सुनते ही नारदजी को बड़ा आश्चर्य हुआ। कहने लगे—“ओह ! संसार सबमुच ही मोह-पाशमें फँसा है। मोहकी मदिराके मारे इसे होश नहीं। मनुष्यने क्रममें पैर लटकवा रखे हैं ; फिर भी विषयोंमें ही उसका मन लगा है।” किसीने ठीक ही कहा है :—

गतं तत्तारुण्यं तत्क्षणिहृदयानन्दजनकं, विशीर्णा दन्तालिनिजगतिरहो यश्चिरणं । जहीभूता दृष्टिः श्रवणरहितं कर्णसुगलं, मनोमे निर्लज्जं तदपि विषयेभ्यःस्पृहयति ॥

तत्क्षणिके हृदयमें आनन्द पैदा करवाली जवानी चली गई है, दन्तपत्तिके गिर गयी हैं, लकड़ीका सहारा लेकर चलता हूँ, नेत्र ज्योति