वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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में वर्त्तमान है। इसी आत्माका चिन्तन करो, तो सदा सच्चा सुख भोग करोगे ; पर आत्मचिन्तन करना सहज काम नहीं है। इसके लिये मनको वशमें करना होगा, उसे विषयोंसे हटाना होगा, उसे बुद्धिसे अलगकर एकाग्र करना होगा। जब चित्त एकाग्र होगा, तभी सफलता हो सकेगी।
I do not see a good end of the deeds done in this world, and when I consider deeply even acts of benevolence which might have lost their their usefulness after they have given the results, fill me with fear. The objects of pleasure which have been acquired by the accomplishment of meritorious deeds and after long sustained efforts, do only give anxiety and torture to the pleasure-seeking mortals when they have to part with them in the flag-end.
उत्सर्वात् निश्चिंशंकया चित्तिर्लं ध्याता गिरिधांतवो
निस्तीर्णाः सरितांपतिर्नृपतयो यत्नेन सतोपिताः ॥
मन्वाराधनत्वरणं मनसा नीताः रमशाने निशाः
प्रातः काण्वराटकोऽपि न मया तुष्येऽधुना मुञ्चभाम् ॥४॥
धन मिलनेकी उम्मीदसे, मैंने जमीनके पैदे तक खोद डाले ; अनेक प्रकारकी पार्वतीय धातुएँ झूँक डालीं ; मातियोंके लिये समुद्र की भी थाह ले आया ; राजाओंका राजी रखनेमें भी कोई बात उठा न रखी ; मन्त्रसिद्धिके लिये रात-रात भर रमशानमें एकाग्रचित्तसे बैठठा हुआ जप करता रहा ; पर अफ़सोसकी बात है, कि इतनी आफ़तें उठाने पर भी एक कानी कौड़ी न मिली। इसलिये हे तुष्ये ! अब तो तू मेरा पीछा छोड़ ॥४॥