वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 47, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें[ २८ ]
है ; पर इससे अपना कुछ घटनेके बजाय उल्टा बढेगा । अगर वह धन दैते तो हमारा भला होता । हम लोग जन्मसे दरिद्र हैं । हमारे घरमें प्रत्येक वस्तुका अभाव है । आजकल धन बिना सुख कहाँ ? धन बिना समाजमें प्रतिष्ठा कहाँ ? जिसके पास धन है, वही सुखी है । निर्धनको इस जगत्में सुख नहीं । दरिद्रीसे भार्द-बन्धु लजाते हैं ; उसे अपना कहनेमें भी उन्हें शम आती है ; इसलिये वे लोग अपना रिश्ता या सम्बन्ध तक छिपाते हैं । दरिद्र विपत्तियोंका घर है । यह मरणका दूसरा पदार्थ है । नाथ ! दरिद्र देहवारियोंको परम दुःख और अपमान है । दरिद्रोंको नाते-रिश्तेदार मरा हुआ ही समझते हैं । शोषसे शोष रही मिट्टीको क्रोमृत है, पर दरिद्रोंको क्रोमृत नहीं ; निर्धन उस मिट्टीसे भी निकम्मा है । हम लोग दरिद्रताके मारे यों हो इस ज़िन्दगीसे आरी आ रहे हैं ; अब तो अपना कुछ और भी बढ़ जायगा । अबतक यह आशा तो थी, कि कभी मृत्यु आकर हमारे कष्टोंका अन्त कर देगी ; पर जब यह फल खा लिया जायगा, तब तो अनन्त काल तक महादरिद्र-कष्ट भोगना पड़ेगा । सारी ज़िन्दगी, जिसका ओर-छोर नहीं, दरिद्रावस्थामें ही व्यतीत करनी पड़ेगी । यह फल तो उनके लिये अच्छा है, जिन्हें परमात्माने धन-रत्न-राजपाठ प्रभृति सभी संसारी सुख दिये हैं । आप यदि मेरो सलाह मानें, तो इसे महाराजा भर्तृहरिको दीजिये और उनसे बदलेमें धन लेकर सुखसे शेष जीवन व्यतीत कीजिये ।”