वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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आपके अनिष्टकी आशङ्का अब भी मेरे हृदयमें खलबली मचाती है। आपको एक दिन पछताना होगा। आपका हृदय मुझे याद करके रोयेगा। परमात्मा आपका मङ्गल करे, आपकी आँख भी मैली न हो।” यह कह कर राजकुमार फौनर समाभवनसे निकल बनको चले गये। महाराज सिर पर हाथ धर कर कुछ सोचमें पड़ गये। इसके बाद कई वर्ष निकल गये। कोई नई घटना न घटी।
नगरीका एक दूरिष्ट ब्राह्मण, अपनी इष्ट-सिद्धिके लिये वनमें जाकर किसी देवताकी घोर तपस्या करता था। उसे तप करते हुए अनेक वर्ष बीत गये। तपःकष्टसे जब उसका शरीर एकदम क्रुश हो गया; तब देवताका आसन हिला। उसने ब्राह्मणके सामने सशरीर आकर उससे कहा—“ब्राह्मण! मैं तेरी तपस्यासे अतीव सन्तुष्ट हुआ हूँ, इसलिये तुझे यह “फल” देता हूँ। यह फल मामूली फल नहीं है। इसका नाम “अमर-फल” है। इसके खानेवाले पर मौतका जोर नहीं चलता। मृत्यु उसका बाल भी बाँका नहीं कर सकती। तू इसे खाकर पृथिवी पर अमर रह और सुखपूर्वक अपनी जिन्दगी बसर कर!” यह कहकर और फल देकर देवता अन्तर्धान हो गया।
ब्राह्मण उस “अमरफल” को लेकर अपने घर आया और अपनी स्त्रीको उस फलका सारा वृत्तान्त कह सुनाया। ब्राह्मणी उस फलकी बात सुन कर सन्तुष्ट नहीं, वरन् असन्तुष्ट हुई। उसने कहा—“नाथ! देवताने आपको ‘अमर फल’ दिया