भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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का पाणिग्रहण किया। जगदीशकी इच्छासे ही, वह सब विधा-बुद्धि विसराकर रानीके कीर्तदास हुए। इससे महाराज का बड़ा उपकार हुआ। ऐसा भला हुआ, जिसकी तुलना नहीं। उनको संसारसे विरक्ति न होती, तो क्या आज उनका नाम इस जगत्में अमर रहता? उनकी कीर्ति अचल होती? उन्होंने जिस महोच्च पद—परमपद—की प्राप्ति कर ली, क्या उसकी प्राप्ति कर सकते? हरगिज़ नहीं। इसीसे कहना पड़ता है, कि महाराज और गोस्वामी तुलसीदासजी दोनों हीको, आरम्भमें, परले स्त्रिके विषयी और स्त्रीण होनेसे ही वैराग्य हुआ। बुराईसे भलाई हुई और परमात्मा जो करता है, वह मनुष्यकी भलाईके लिये ही करता है, यह बात सत्य प्रमाणित हुई। विषवृक्षसे अमृत-फलकी उत्पत्ति हुई। ठीक गोस्वामि तुलसीदासजी की सी घटना घटी। गुसाईं जीको भी खींचे ही कारणसे वैराग्य हुआ और हमारे महाराजको भी खींचे ही कारणसे। हाँ, घटनाक्रममें थोड़ा अन्तर अवश्य है।

स्त्रियोंके स्वभावकी कोई बात समझमें ही नहीं आती। ये अपने व्याहता सुन्दर, खूबसूरत, नौजवान, बलवान, वीर्यवान, चतुर और कामकला-कुशल पतिको त्याग कर एक नीच-कुलोत्पन्न, गंवार, वदसूरत, कालेकल्लूटे, अघेड़ और बूढ़े पर मरने लगती हैं। ये पुरुषमात्रको भोगनेकी इच्छा रखती हैं। इन्हें वयस और रूपकुरुपसे कोई मतलब नहीं। इन्हें न कोई प्यारा है न कुप्यारा। जिस तरह गाय नई-नई घास पसन्द