वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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जाती है। अगर भावीके अनुसार बुद्धि न हो जाय, तो भावी कैसे हो ? दशरथनन्दन महाराजा रामचन्द्र तो विष्णुके अवतार माने जाते हैं; वे कुटियामें सीताको छोड़कर, सोनेके हिरनके पीछे तीर कमान लेकर क्यों भागे ? साधारण आदमी भी समझ सकता है, कि सोनेका हिरन नहीं हो सकता—सुवर्ण मृगका होना असम्भव है। पर भगवान् रामचन्द्रजीको इतना भी ख्याल न हुआ ! हो कैसे ? होनी तो कुछ और ही थी। जैसी होनी थी, वैसी ही बुद्धि रामचन्द्रजीकी हो गई। उनके और लक्ष्मणजीके सीताको सूनी छोड़ जानेसे, रावणको मौका मिला और वह यतिका वेष धरकर सीताको लड्डामें ले गया। परिणाममें खोर युद्ध हुआ और रावण मारा गया।
हमारे प्रातःस्मरणीय महाराज भर्तृहरिकी बुद्धि यदि नहीं मारी जाती, वे पिङ्गलाके हाथकी कठपुतली न हो जाते; तो पिङ्गलाको व्यभिचारिणी होनेका मौका कैसे मिलता ? प्राण-प्यारे भाई विक्रमसे वियोग कैसे होता ? शेषमें, अपनी प्राण-प्रियाके कुकर्मका हाल जानकर, महाराजको विरक्ति कैसे होती और वे राजपाट त्यागकर आदर्श योगिराज कैसे होते ? कहते हैं, संसारमें एक पत्ता भी बिना परमेश्वरकी मरज़ोके नहीं हिलता। इस जगत्में जो कुछ होता है, वह जगदीशकी इच्छासे होता है; वे जो चाहते हैं, सो करते हैं। पर जगदीश जो करते हैं, वह प्राणीकी भलाईके लिए करते हैं; इसमें सन्देह नहीं। जगदीश की इच्छासे ही, कई रानियोंके होते हुए भी, महाराजने पिङ्गला