वैराग्य शतक

वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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वैराग्यशतक ॥ ४ ॥
गोस्वामी तुलसीदासजी नदी पार कर छतराल पहुँचे, द्वार बन्द पाकर सर्प को रस्सी समझ डले पकड़ ऊपर चढ़ गये। जब स्त्री के सामने पहुँचे—स्त्री कहने लगी:—“आप का जितना प्रेम मुझ में है, उतना उस जगदीश में हो, तो आप का भला हो जाय।