भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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क्या स्त्रीमें आनन्द है ?

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स्त्रीमें कुछ भी आनन्द नहीं है। स्त्री हर तरह दुःखोंकी ध्वान और मनकी अशान्तिकी मूल है। स्त्रीसे मैथुन करनेमें पुरुषको जो आनन्द आता है, वह उसका अपना आनन्द है; स्त्रीका नहीं। कुत्ता सूखी हड्डी खवाता है; पर सूखी हड्डीमें धून नहीं होता। कुत्तेका अपना धून निकलता है और उसे उसीका स्वाद आता है, पर वह अज्ञानी उस आनन्दको हड्डी में समझता है। विषयी पुरुष भी कुत्तेकी तरह ही है। विषय जड़ है। विषयोंमें आनन्द कहाँ? आनन्द आत्मामें है। जब पुरुषका वीर्य मैथुनके अन्तमें स्खलित होता है, तब क्षण-भरके लिये मनकी वृत्ति स्थिर हो जाती है। उस स्थिर वृत्तिमें चेतन आत्माका अक्स पड़ता है। बस, उसीसे पुरुषको आनन्द आता है। पर अज्ञानसे, कुत्तेकी तरह, वह उस आनन्दको स्त्रीमें समझता है। तात्पर्य यह निकला कि, स्त्रीमें कुछ भी आनन्द नहीं, आनन्द आत्मामें है।

स्त्री-त्यागी ही परिणत है।

मनुष्यों और पशुओंमें क्या भेद है? मनुष्य खाते, सोते, डरते और स्त्री-भोग करते हैं और पशु भी यही चारों काम करते हैं। पर इन दोनोंमें अन्तर यही है कि, मनुष्यको धर्म-