भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ७४ )

ज्ञान है और पशु को नहीं। यदि मनुष्य पशुओंकी तरह अज्ञानी हो, तो वह भी पशु ही है। कहा है—

अधीत्य वेदशास्त्राणि, संसारे रागिणश्च ये ।

तेभ्यः परो न मूर्खोऽस्ति, सर्वां श्वाश्वसूकरैः ॥

जो पुरुष वेद-शास्त्रोंको पढ़कर भी संसार से या स्त्री-पुत्र आदिकी प्रीति रखते हैं, उनसे बढ़कर मूर्ख कौन है? क्योंकि स्त्री-पुत्र प्रभृतिमें तो कुत्ते, घोड़े और सूअर भी प्रेम रखते हैं। शुक्रदेवजाने भी “भागवत”में कहा है :—

मानुष्यं दुर्लभं प्राप्य, वेदशास्त्राण्यधीत्य च ।

वध्यते यदि संसारे, का विमुच्येत मानवः ?

दुर्लभ मनुष्य-बोला पाकर और वेद-शास्त्र पढ़कर भी यदि मनुष्य संसारमें फँसा रहे, तो फिर संसार-बन्धनसे छुट्टेगा कौन ?

कबीरदासजी कहते हैं :—

काम क्रोध मद लोभकी, जब लग घटमें खानि ।

कहा मूर्ख कहा पंडिता, दोनों एक समान ॥

जब तक मनमें काम, क्रोध, मद और लोभ है, तब तक पण्डित और मूर्ख दोनों समान हैं। जिसमें काम, क्रोध, मद और लोभ नहीं, वही पण्डित है और जिसमें ये हैं वह मूर्ख या अज्ञानी है।