भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ७५ )

शङ्कराचार्यकृत “प्रश्नोत्तरमाला”में लिखा है :—

शून्यमहाशून्यतमोऽस्ति का वा ?

मनेजवागैर्व्यथितो न यस्तु ।

प्राज्ञोऽति धीरश्च शमोऽस्ति को वा ?

प्राप्ता न मोहं ललनाकटाक्षैः ॥

संसारमें सबसे बड़ा शूरवीर कौन है ? जो काम-बाणों से पीड़ित नहीं है । प्राज्ञ, धीर और समदर्शी कौन है ? जिसे स्त्रीके कटाक्षोंसे मोह नहीं होता ।

महात्मा तुलसीदासजीको स्त्रीसे विरक्ति ।

एक बार महात्मा तुलसीदासजी की स्त्री अपने पीहर चढ़ी गई ; महात्माजीको आधी रातके समय स्त्री-प्रसंगकी इच्छा हुई । आपकी ससुराल और आपके गाँवके बीचमें नदी पड़ती थी । आप फौरन ही घर छोड़ ससुरालको चल दिये । भयङ्कर रातमें प्रबल वेगसे बहती हुई नदीको पार कर आप ससुराल पहुँच गये । लेकिन जब घरके द्वार पर पहुँचे तो पौलीका द्वार बन्द पाया । अब आप मकानमें चढ़ने की तरकीब सोचने लगे । इतनेमें आपको एक रस्सी सी नज़र आई, आप उसे पकड़ कर चढ़ गये और अपनी स्त्रीके कमरे में जा पहुँचे । स्त्री आपको देखते ही चौकन्नीसी हो गयी ।