भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ७६ )

आपने कहा—“प्यारी ! मैं तेरे लिये इस समय महा कष्ट भोग कर आया हूँ । मेरी अभिलाषा पूर्ण कर ।”

स्त्री आपको देखते ही पल्लगसे नीचे बैठ गई और बोली—“हे मेरे पतिदेव ! देखिये तो रात कैसी भयावनी हो रही है । बादलोंकी गड़गड़ाहट और बिजलीकी कड़कसे मनुष्य का हृदय काँप उठता है । उधर नदी चढ़ रही है । आपने अपने शरीरकी परवा न कर मुझे दर्शन दिये; इसलिये मैं आप की अनुग्रहीत हूँ । परन्तु स्वामिन् ! यह तो बताइये, आप मकानमें आये कैसे, क्योंकि द्वार बन्द है ?” आपने कहा—“एक रस्ती लटक रही थी, उसीके सहारे मैं चढ़ आया ।” स्त्रीने जाकर देखा, तो वह रस्ती नहीं, बरन् एक लम्बा-चौड़ा काल-सर्प था । देखते ही स्त्रीके सिरमें चक्कर आगया । उसके मुँहसे इतना ही निकला—“स्वामिन् ! जितना प्रेम आपका मुझमें है, यदि इतना ही हरिमें होता, तो आपका निश्चय ही बड़ा उपकार होता ।

“जितना प्रेम हरामसे, उतना हरिसे होय ।

चला जाय वैकुण्ठके, पलान पकड़े काय ।”

कहते हैं, तुलसीदासजी तत्क्षण उसे गुरु कह कर बनको चले गये ।

पुरुष आठ पहर-चौंसठ घड़ी स्त्रीकी सेवा करता है, उसे हर तरह प्रसन्न रखनेकी चेष्टा करता है, उसकी आज्ञा-पालनके लिये तैयार रहता है, आप नाना प्रकारके कष्ट

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