भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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बीच महलसे राजाको ले गया। सब देखते-के-देखते रह गये। वही बलवान काल तुम्हारी घातमें तुम्हारे सिरपर मँडरा रहा है। आप भी उससे किसी तरह बच नहीं सकते।

यह दुनिया नापायेदार है, मनुष्य-शरीरका कोई ठिकाना नहीं; फिर भी मनुष्यके अभिमानकी सीमा नहीं। थोड़ी सी विषय-सम्पत्ति पर वह इतना इतरा उठता है, कि ईश्वरको भी माल नहीं समझता। उस्ताद जौकने ठीक ही कहा है—

मौत ने कर दिया नाचार, वगनी इन्हीं।

है वह खुदबी, कि खुदाका भी न क़ायल होता ॥

मनुष्य के घमण्डका कुछ ठिकाना है—किसीको कुछ नहीं समझता। मौत ने इसे लाचार कर रक्खा है, नहीं तो यह ईश्वरको भी कुछ न समझता।

शिक्षा—अगर अपना भला चाहते हो, तो अभिमान को त्यागो; यह बड़ा भारी शत्रु है। जिन्होंने इसकी संगति की, उन्हींका नाश हुआ। अभिमान से ही उस लंकाविपत्ति रावणका नाश हुआ, जिसने त्रिलोकीको अपने अधीन कर रक्खा था और जो देवताओंसे सेवा और हवा-पानीसे टहल कराता था। अभिमानसे ही सप्यहके मार्त्तण्डकी भाँति तपते हुए देहलीके सुगल बादशाह औरज्जनेवकी सस्तनतकी जड़ हिल गई, सुगलिया खान्दानसे बादशाहत विदा हो ही गई। अभिमान ने ही उस जर्मन कैसरको रव्से रङ्ग बना दिया, जिसने छोड़ेसे देशका राजा होकर भी, सारी पृथ्वी को चार साल तक अपनी उँगली पर नचाया। भाइयो, इन दृष्टान्तोंको ध्यानमें रखकर, अपने प्रबल शत्रु-अभिमानका नाश करो।