भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ६२ )

छप्पय ।

छिनहूँ छाँड़ी नाहि, भोग भुगती वह भूयनि ।

कुलटासी यह भूमि, लाभ मानत महीप मनि ।

ताहू के इक अंग के, सु अंगहि को पावत ।

राखत हैं करि कष्ट, दिवस निशि चहूँ दिशि धावत ।

अपनी ओरकी होत यह, यातें पचि-पचि रचि रहे ।

पछितैवौ तजि जग-विषयसों, जड़ उरुटे सुख गनि रहे ॥२५॥

25. Why should kings feel so much pride in the ownership of the earth, which has successively been owned by hundreds of kings without the break of even a second. It is a pity that petty kings who possess even a very small portion of it, foolishly find pleasure in the possession of their estates while really they ought to grieve over it as their power is not going to endure for ever.

मृत्पिण्डो जलरेखया वलपितः सर्वोऽप्ययं नान्धु-

रणीकृत्य स एव संयुगशतै राज्ञां गणैर्भुज्यते ।

तद्वदुद्वदतेऽथवा न किमपि क्षुद्रा ददिता भृशं

विश्विकान्पुरुषाधमान्धनकर्णं वाञ्छन्ति तेष्योऽपि ये ॥२६॥

भृगति=राजा लोग । महीप=राजा । कुतश्च=अभिचारिणी ओ । दिवस निशि=रात-दिन । चहूँ दिशि=चारों दिशाओंमें । धावत=दौड़ते हैं । पछितैवौ तजि=पछताना छोड़कर । जड़=मूर्ख । छल गनि रहे=छल मान रहे हैं ।