भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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अब्वल तो यह पृथ्वी स्वयं ही बड़ी नहीं है।१ मिट्टीका सा लौदा है, जो चारों ओरसे पानीसे घिरा हुआ है। दूसरे ; सैकड़ों-हज़ारों राजाओंने आपसमें अनेक लड़ाइयाँ लड़-लड़कर, इसके भागों पर अपना-अपना कब्जा कर रखाहै। ऐसे खुद और संकीर्ण-हृदय-राजाओंका जो दानी सम्भूते हैं और उनके मुँहकी ओर ताकते हैं कि वे कुछ देंगे, ऐसे नीच लोगोंका धिक्कार है ! ऐसे तुच्छ और दरिद्रियोंसे धनपानेकी आशा करना व्यर्थ है ॥२६॥

अब्वल तो पृथ्वी कोई चीज़ ही नहीं है। फिर, यह ज़रासा मिट्टीका लौदा है, जो चारों ओरसे सीमा-बद्ध है, चारों ओर इसके खुद है। फिर ; इस खुद पृथ्वीको भी अनेक राजाओं ने आपसमें खुद कर-करके अपने-अपने अधिकारमें कर रक्खा है। ज़रासी चीज़के हज़ारों टुकड़े हो गये हैं। इन टुकड़ोंके मालिकोंको जो लोग बड़े आदमी और दानी सम्भूते हैं और उनसे कुछ पानेकी आशा करते हैं, उनको बारम्बार धिक्कार है ! क्योंकि उन नामके भूपतियोंके पास रक्खा ही क्या है ? वे स्वयं द्रिद्र हैं। जब वे स्वयं द्रिद्र और सुहताज हैं, तब वे किसकी आशा पूरी कर सकते हैं ? इसलिये, ऐसे खुदोंका मुँह ताकना नीचोंका काम है। मुँह उसका ताकना चाहिये, जो किसी लायक हो। मनुष्यको जो माँगना हो, सर्वशक्तिमान् भगवान् से माँगना चाहिये ; वही सबकी इच्छा पूरी कर सकता है। खुद धनियोंकी खुशामदमें समय गँवाना, वृथा जन्म खोना

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