वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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है। वे आप-दीन हैं। उनकी इच्छायेँ क्या पूरी हो गई हैं ? अमीर-गरीब सभी ज़रूरतें रखते हैं। इसलिये दोनों ही दीन हैं। अमीरोंकी ज़रूरतें गरीबोंसे ज़ियादा हैं, इसलिये वे दीनातिदीन हैं। ऐसे दीनोंसे भी जो माँगते हैं, वे बड़े ही निर्बद्ध हैं। अगर माँगना हो है, तो बादशाहों-के-बादशाहसे माँगो। महात्मा कबीरदास कहते हैं—
कबिरा जग की कहा कहूँ, जो भल बूढ़े दास । पारवन्ध पति छँडि के, करै मनुष्य की आस ॥ रामहिं थोरा जानि के, दुनिया आगे दीन । जीवन को राजा कहै, माया के आधीन ॥ राम धनी सिर पर खड़ा, कहा कमी तोहि दास । स्मृष्टि सिद्धि सेवा करें, मुक्ति न छँड़े पास ॥ दास दुखी तो हरि दुखी, यदि चन्त तिहुँकाल । पलक एक में परगटे, पल में करे निहाल ॥ जाकी गँठी राम है, ताके हैं सब सिद्धि । कर जोरे ठाढ़ी सबैं, अष्ट सिद्धि नव निद्धि ॥
कबीरदास कहते हैं कि, मैं जगत्के विषयमें क्या कहूँ ? वे लोग बुढ़ी तरह झूब रहे हैं, जो परमब्रह्म परमात्माको छोड़कर शुद्ध मनुष्योंकी आशा करते हैं।
लोग रामको तो कम समझते हैं और दुनियाँके आगे