वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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दीनता करते हैं तथा मायाके वश होकर जीवोंको राजा कहते हैं।
हे दास ! राम जैसा मालिक तेरे सिर पर खड़ा है, फिर तुझे क्या अभाव है ? उसकी कृपासे ऋद्धि-सिद्धि तेरो सेवा करेंगी और मुक्ति तेरे पीछे फिरेगी।
अगर सेवक दुःखी रहता है, तो परमात्मा भी तीनों कालों में दुःखी रहता है। वह दासको कष्टमें देखकर, क्षणभरमें प्रकट होता और उसे निहाल कर देता है।
जिसकी गाँठमें राम है, उसके पास सब सिद्धियाँ हैं। उसके आगे अष्ट सिद्धि और नौ निधि हाथ जोड़े खड़ी रहती हैं।
गोस्वामी तुलसीदासजीने भी कहा है :—
गरल सुषा, रिपु करें मितार्ई ; गोपद सिन्धु, अनल सितलार्ई ।
गरुड सुमेरु रेणु-सम ताही, राम कृपा करिचितर्वाहि जाही ।।
भगवान् जिसकी ओर कृपासे देखते हैं, उसके लिये जूहर अमृत हो जाता है, शत्रु मित्र हो जाते हैं, समन्दरमें गौके स्वरण डूबें उतना जल हो जाता है, आग शीतल हो जाती है, और भारी सुमेरु-पर्वत रेणुके समान हो जाता है।
बहुतसे मूर्ख इन धनमत्तोंसे यहाँतक कह बैठते हैं— “हुजूर ! हम बड़े सङ्कटमें हैं, हमारी नाव मंझधारमें है, उसे पार लगाइये।” यह बड़ी भद्दी भूलकी बात है। नावका पार लगाना, मनुष्यके हाथ नहीं; डूबती हुई नावको वह सर्व-