वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २६ )
शक्तिमान् ही पार लगा सकता है ; अतः बुद्धिमान् लोग उसी के भरोसे रहते हैं, वे तुल्य मनुष्योंके ऐहसान सिरपर नहीं लेते ।
उस्ताद जौकने क्या खूब कहा है :—
अहसाने नाखुदा के, उठाये मेरी बला ।
किरती खुदा पै छोड़ दूँ, लंगरको तोड़ दूँ ॥
माँकीके अहसान मेरी बला उठाये, मैं तो अपनी नाबको ईश्वरका नाम लेकर छोड़ दूँ गा और उसका लङ्गर तोड़ दूँ गा ।
छप्पय ।
इक मृत्तिकाको पिण्ड, रहत जलमौहि निरन्तर ।
सोज सब ही नाहिं, तनकसौ, ताहूँ में डर ।
करत हजारन अंग, भूप तब भोग करत चित ।
मिटत आपनी प्यास, दान को होत कहा चित ? ।
ऐसे दरिद्र दुखसों भरे, तिनहूँ सों जो चहत धन ।
धिङ्कार जन्म वा अश्वसको, सदा सर्वदा लीन मन ।।२६॥
26. In the first place this earth, which is surrounded on all sides by a line of water, is not large enough itself. Secondly, it is divided and owned by multitudes of kings after fighting hundreds
दुःखिका = सिही । पिण्ड = गोला । निरन्तर = सदा । तनकसो = छोटांसा । हजारन अंग = हजारों भाग या कड़े । अश्वस = नीच ।