वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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सहता, जने-जनेकी खुशामद करता, नर्म-गर्म सहता, पर स्त्री के लिये तो कुछ न कुछ लेकर ही घरमें घुसता है ; रात-दिन बाहर-भीतर उसीका ध्यान रखता और उसके लिये अपने प्राणों तककी परवा नहीं करता । इसके एवजमें स्त्रीसे उसे क्या मिलता है ? भग या पेशाबका पात्र । दिन-रात चिन्ता और अशान्ति । यहाँ नरक और वहाँ नरक । अगर पुरुष इतनी ही या इससे कुछ कम भक्ति भी परमात्माको करे, तो निश्चय ही उसका उपकार हो सकता है । इस जन्ममें उसे सुख-शान्ति मिले और देह छोड़ने पर स्वर्ग या परमपद मिले । शङ्कराचार्यजी ने कहा है :—
कामं क्रांथं लोभं मोहं त्यक्त्वात्मानं पश्य हि कांशहम् ।
आत्मज्ञानविहीना मूढाः ते पच्यन्ते नरकनिगूढाः ॥
काम, क्रोध, लोभ और मोहको छोड़कर आत्मामें देख कि, मैं कौन हूँ । जो आत्मज्ञानी नहीं हैं, जो अपने स्वरूप या आत्माके सम्बन्धमें नहीं जानते, वे मूर्ख नरकोंमें पड़े हुए पकते हैं ।
जहाँ स्त्री होगी, वहाँ काम, क्रोध, लोभ और मोह अवश्य होंगे ; और जहाँ ये होंगे, वहाँ भगवान् नहीं होंगे । मतलब यह है कि, जब मनुष्यके हृदयमें काम, क्रोध आदिक नहीं रहते, तब उसका हृदय शुद्ध रहता है । शुद्ध हृदयमें ही आत्माका दर्शन होता है । जिस तरह साफ़ आईनेमें सुँह स्पष्ट दीखता