भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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है, स्थिर और निर्मल जलमें सूर्य-बिम्ब साफ दीखता है ; उसी तरह शुद्ध, स्थिर और निर्मल मनमें परमात्मा साफ दीखता है ।

शिक्षा—जो परमात्माके दर्शन करना चाहें ; जो सदा छव भोगना चाहें, जो भव-बन्धनसे पीड़ा छुड़ाना चाहें, उन्हें कामिनी और काञ्चनमें आसक्ति न रखनी चाहिये । जो इनमें मन लगाये रहते हैं, उन्हें सिद्धि नहीं मिलती—भगवान् उनसे सदा दूर रहते हैं ।

कुच आमिषकी गौठ, कनकके कलश कहत छवि ।

सुखहु कफको धाम, कहत शशिके समान कवि ।

भरत मूत्र अरु धातु, भरी दुर्गन्ध ठौर सब ।

ताकी चंपकबेल कहत, रस रेल टेल दब ।

यह नारि निहारी निन्दतन, बहँके विषयी बावरे ।

याकों बढाय, वाकों विरद, बोले बहुत उतावरे ॥२०॥

20. The breasts of a woman which are nothing but lumps of flesh, are likened by poets to a pair of vessel made of gold. Her mouth which is only a depository of saliva is likened to the moon. Her thighs although wet with falling drops of urine are likened to the trunk of an elephant. Oh ! how contemptible is the person of a woman which is so servilely flattered by the poets !

कुच=लतन । आमिष=मांस । कनक=सोना । कलश=घड़ा । धाम= वर । शशि=चन्द्रमा ठौर=जगह । चंपकबेल=चम्पकलता बावरे=पागल बिरद=तारीफ कर ।

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