भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ७६ )

आज्ञानम्माहात्म्यं पततु शलभो दीपदहने स भीनोऽप्यज्ञानाद्विशयुतमश्वातु पिथितम् ॥

विज्ञानन्तोऽप्येतान्वयमिह विपद्जालनटिला-

न्मृञ्चामः कामानहह गहनो मोहमहिमा ॥ २१ ॥

अज्ञानवश, पतङ्ग दीपक की लौ पर गिरकर अपने तर्द भस्म कर लेता है ; क्योंकि वह उसके परियायके नहीं जानता ; इसी तरह मछली भी कौटिके मांस पर मुँह चलाकर अपने प्राण खोती है, क्योंकि वह उससे अपने प्राण-नाशकी बात नहीं जानती । परन्तु हम लोग तो अच्छी तरह जान-बूझकर भी विपद्-मूलक विषयेकी अभिलाषा नहीं त्यागते । मोहकी महिमा कैसी विस्मय-कर है ! ॥२१॥

पतङ्ग दीपकके रूपपर मरता है, उसके प्रेममें रँगा रहता है ; इसलिये उसको आलिङ्गन करनेके लिये उसपर भगटकर गिरता है और अपना नाश कराता है । पतङ्गको ज्ञान नहीं है, कि इस पर गिरनेसे मेरी मौत हो जायगी । इसी तरह मछली मछुएके लगाये हुए कौटिके मांस पर मुँह लपकाती है और कण्ठमें काँटा लगनेसे मर जाती है ; क्योंकि वह नहीं जानती, कि मेरी मृत्युका सामान है । पतङ्ग और मछली तो अज्ञानवश अपनी जान खोते हैं ; पर आश्चर्य तो यह है कि, मनुष्य—जिसे भगवान्ने समर्थ दी है, जो जानता

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