भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

( ६४ )

है। वे आप-दीन हैं। उनकी इच्छायेँ क्या पूरी हो गई हैं ? अमीर-गरीब सभी ज़रूरतें रखते हैं। इसलिये दोनों ही दीन हैं। अमीरोंकी ज़रूरतें गरीबोंसे ज़ियादा हैं, इसलिये वे दीनातिदीन हैं। ऐसे दीनोंसे भी जो माँगते हैं, वे बड़े ही निर्बद्ध हैं। अगर माँगना हो है, तो बादशाहों-के-बादशाहसे माँगो। महात्मा कबीरदास कहते हैं—

कबिरा जग की कहा कहूँ, जो भल बूढ़े दास । पारवन्ध पति छँडि के, करै मनुष्य की आस ॥ रामहिं थोरा जानि के, दुनिया आगे दीन । जीवन को राजा कहै, माया के आधीन ॥ राम धनी सिर पर खड़ा, कहा कमी तोहि दास । स्मृष्टि सिद्धि सेवा करें, मुक्ति न छँड़े पास ॥ दास दुखी तो हरि दुखी, यदि चन्त तिहुँकाल । पलक एक में परगटे, पल में करे निहाल ॥ जाकी गँठी राम है, ताके हैं सब सिद्धि । कर जोरे ठाढ़ी सबैं, अष्ट सिद्धि नव निद्धि ॥

कबीरदास कहते हैं कि, मैं जगत्के विषयमें क्या कहूँ ? वे लोग बुढ़ी तरह झूब रहे हैं, जो परमब्रह्म परमात्माको छोड़कर शुद्ध मनुष्योंकी आशा करते हैं।

लोग रामको तो कम समझते हैं और दुनियाँके आगे

( ६५ )

दीनता करते हैं तथा मायाके वश होकर जीवोंको राजा कहते हैं।

हे दास ! राम जैसा मालिक तेरे सिर पर खड़ा है, फिर तुझे क्या अभाव है ? उसकी कृपासे ऋद्धि-सिद्धि तेरो सेवा करेंगी और मुक्ति तेरे पीछे फिरेगी।

अगर सेवक दुःखी रहता है, तो परमात्मा भी तीनों कालों में दुःखी रहता है। वह दासको कष्टमें देखकर, क्षणभरमें प्रकट होता और उसे निहाल कर देता है।

जिसकी गाँठमें राम है, उसके पास सब सिद्धियाँ हैं। उसके आगे अष्ट सिद्धि और नौ निधि हाथ जोड़े खड़ी रहती हैं।

गोस्वामी तुलसीदासजीने भी कहा है :—

गरल सुषा, रिपु करें मितार्ई ; गोपद सिन्धु, अनल सितलार्ई ।

गरुड सुमेरु रेणु-सम ताही, राम कृपा करिचितर्वाहि जाही ।।

भगवान् जिसकी ओर कृपासे देखते हैं, उसके लिये जूहर अमृत हो जाता है, शत्रु मित्र हो जाते हैं, समन्दरमें गौके स्वरण डूबें उतना जल हो जाता है, आग शीतल हो जाती है, और भारी सुमेरु-पर्वत रेणुके समान हो जाता है।

बहुतसे मूर्ख इन धनमत्तोंसे यहाँतक कह बैठते हैं— “हुजूर ! हम बड़े सङ्कटमें हैं, हमारी नाव मंझधारमें है, उसे पार लगाइये।” यह बड़ी भद्दी भूलकी बात है। नावका पार लगाना, मनुष्यके हाथ नहीं; डूबती हुई नावको वह सर्व-

( २६ )

शक्तिमान् ही पार लगा सकता है ; अतः बुद्धिमान् लोग उसी के भरोसे रहते हैं, वे तुल्य मनुष्योंके ऐहसान सिरपर नहीं लेते ।

उस्ताद जौकने क्या खूब कहा है :—

अहसाने नाखुदा के, उठाये मेरी बला ।

किरती खुदा पै छोड़ दूँ, लंगरको तोड़ दूँ ॥

माँकीके अहसान मेरी बला उठाये, मैं तो अपनी नाबको ईश्वरका नाम लेकर छोड़ दूँ गा और उसका लङ्गर तोड़ दूँ गा ।

छप्पय ।

इक मृत्तिकाको पिण्ड, रहत जलमौहि निरन्तर ।

सोज सब ही नाहिं, तनकसौ, ताहूँ में डर ।

करत हजारन अंग, भूप तब भोग करत चित ।

मिटत आपनी प्यास, दान को होत कहा चित ? ।

ऐसे दरिद्र दुखसों भरे, तिनहूँ सों जो चहत धन ।

धिङ्कार जन्म वा अश्वसको, सदा सर्वदा लीन मन ।।२६॥

26. In the first place this earth, which is surrounded on all sides by a line of water, is not large enough itself. Secondly, it is divided and owned by multitudes of kings after fighting hundreds

दुःखिका = सिही । पिण्ड = गोला । निरन्तर = सदा । तनकसो = छोटांसा । हजारन अंग = हजारों भाग या कड़े । अश्वस = नीच ।

( ७७ )

सहता, जने-जनेकी खुशामद करता, नर्म-गर्म सहता, पर स्त्री के लिये तो कुछ न कुछ लेकर ही घरमें घुसता है ; रात-दिन बाहर-भीतर उसीका ध्यान रखता और उसके लिये अपने प्राणों तककी परवा नहीं करता । इसके एवजमें स्त्रीसे उसे क्या मिलता है ? भग या पेशाबका पात्र । दिन-रात चिन्ता और अशान्ति । यहाँ नरक और वहाँ नरक । अगर पुरुष इतनी ही या इससे कुछ कम भक्ति भी परमात्माको करे, तो निश्चय ही उसका उपकार हो सकता है । इस जन्ममें उसे सुख-शान्ति मिले और देह छोड़ने पर स्वर्ग या परमपद मिले । शङ्कराचार्यजी ने कहा है :—

कामं क्रांथं लोभं मोहं त्यक्त्वात्मानं पश्य हि कांशहम् ।

आत्मज्ञानविहीना मूढाः ते पच्यन्ते नरकनिगूढाः ॥

काम, क्रोध, लोभ और मोहको छोड़कर आत्मामें देख कि, मैं कौन हूँ । जो आत्मज्ञानी नहीं हैं, जो अपने स्वरूप या आत्माके सम्बन्धमें नहीं जानते, वे मूर्ख नरकोंमें पड़े हुए पकते हैं ।

जहाँ स्त्री होगी, वहाँ काम, क्रोध, लोभ और मोह अवश्य होंगे ; और जहाँ ये होंगे, वहाँ भगवान् नहीं होंगे । मतलब यह है कि, जब मनुष्यके हृदयमें काम, क्रोध आदिक नहीं रहते, तब उसका हृदय शुद्ध रहता है । शुद्ध हृदयमें ही आत्माका दर्शन होता है । जिस तरह साफ़ आईनेमें सुँह स्पष्ट दीखता

( ७८ )

है, स्थिर और निर्मल जलमें सूर्य-बिम्ब साफ दीखता है ; उसी तरह शुद्ध, स्थिर और निर्मल मनमें परमात्मा साफ दीखता है ।

शिक्षा—जो परमात्माके दर्शन करना चाहें ; जो सदा छव भोगना चाहें, जो भव-बन्धनसे पीड़ा छुड़ाना चाहें, उन्हें कामिनी और काञ्चनमें आसक्ति न रखनी चाहिये । जो इनमें मन लगाये रहते हैं, उन्हें सिद्धि नहीं मिलती—भगवान् उनसे सदा दूर रहते हैं ।

कुच आमिषकी गौठ, कनकके कलश कहत छवि ।

सुखहु कफको धाम, कहत शशिके समान कवि ।

भरत मूत्र अरु धातु, भरी दुर्गन्ध ठौर सब ।

ताकी चंपकबेल कहत, रस रेल टेल दब ।

यह नारि निहारी निन्दतन, बहँके विषयी बावरे ।

याकों बढाय, वाकों विरद, बोले बहुत उतावरे ॥२०॥

20. The breasts of a woman which are nothing but lumps of flesh, are likened by poets to a pair of vessel made of gold. Her mouth which is only a depository of saliva is likened to the moon. Her thighs although wet with falling drops of urine are likened to the trunk of an elephant. Oh ! how contemptible is the person of a woman which is so servilely flattered by the poets !

कुच=लतन । आमिष=मांस । कनक=सोना । कलश=घड़ा । धाम= वर । शशि=चन्द्रमा ठौर=जगह । चंपकबेल=चम्पकलता बावरे=पागल बिरद=तारीफ कर ।

( ७६ )

आज्ञानम्माहात्म्यं पततु शलभो दीपदहने स भीनोऽप्यज्ञानाद्विशयुतमश्वातु पिथितम् ॥

विज्ञानन्तोऽप्येतान्वयमिह विपद्जालनटिला-

न्मृञ्चामः कामानहह गहनो मोहमहिमा ॥ २१ ॥

अज्ञानवश, पतङ्ग दीपक की लौ पर गिरकर अपने तर्द भस्म कर लेता है ; क्योंकि वह उसके परियायके नहीं जानता ; इसी तरह मछली भी कौटिके मांस पर मुँह चलाकर अपने प्राण खोती है, क्योंकि वह उससे अपने प्राण-नाशकी बात नहीं जानती । परन्तु हम लोग तो अच्छी तरह जान-बूझकर भी विपद्-मूलक विषयेकी अभिलाषा नहीं त्यागते । मोहकी महिमा कैसी विस्मय-कर है ! ॥२१॥

पतङ्ग दीपकके रूपपर मरता है, उसके प्रेममें रँगा रहता है ; इसलिये उसको आलिङ्गन करनेके लिये उसपर भगटकर गिरता है और अपना नाश कराता है । पतङ्गको ज्ञान नहीं है, कि इस पर गिरनेसे मेरी मौत हो जायगी । इसी तरह मछली मछुएके लगाये हुए कौटिके मांस पर मुँह लपकाती है और कण्ठमें काँटा लगनेसे मर जाती है ; क्योंकि वह नहीं जानती, कि मेरी मृत्युका सामान है । पतङ्ग और मछली तो अज्ञानवश अपनी जान खोते हैं ; पर आश्चर्य तो यह है कि, मनुष्य—जिसे भगवान्ने समर्थ दी है, जो जानता

( ८० )

है कि, विषयोंकी कामना आफतकी जड़ है, विषयोंमें सुख नहीं, घोर विपद है; विषय विषसे भी अधिक दुःखदायी है,— विषयोंकी इच्छा करता है। इससे कहना पड़ता है कि, मोहकी माया बड़ी कठिन है। महात्मा कबीरदास कहते हैं :—

शंकर हूँ ते सबल है, माया या संसार ।

अपने बल छूटे नहीं, छुड़ावे सिरजनहार ॥

21 The moth may burn itself by falling over the flame of a lamp, because it is ignorant of the result of its action, The fish may swallow the bait hung by a fisherman, because it is similarly ignorant, How wonderful should the force of attachment be, that we, being thoroughly conversant with the result of action, do not care to renounce the network which brings distress and misery in the end !

फलमलमशनाय स्वादुपानाय तोयं

शयनमवनिष्ठे वलकले वाससी च ।

नवधनमधुपानश्रान्तसर्वेन्द्रियाणा-

मविनयमखुमन्तु नोत्सहे दुर्जनानाम् ॥२२॥

खानेके लिये फलोंकी इफ़्फ़रात है, पीनेके लिये मीठा जल है, पहननेके लिये वस्त्रोंकी खाल है; फिर हम धनमदसे मतवाले दुष्टोंकी बातें क्यों सहे ? ॥२२॥

( ८१ )

जबकि भगवान् ने हमारे लिये खानेको फल-ही-फल पैदा कर दिये हैं, पीनेको जगह-जगह मीठा और शीतल जल भर दिया है, पहनने के लिये दरख्तों को छाल पैदा कर दी है; फिर क्या ज़रूरत, जो हम धनसे मतवाले लोकोके ताने और कटोर बचन सहेँ ?

मनुष्यको सन्तोष नहीं, उसे तुष्णा नहीं छोड़ती ; इसीसे वह विषयोंके भोगनेकी लालसा से धनियों की खुशामद करता है, उनकी टेढ़ी-सूथी सुनता है, अपनी प्रतिष्ठा खोता है, निरादर और अपमान सहता है। अगर वह सन्तोष कर ले, तो उसे ऐसे दुष्टों और धन-मदसे मतवाले शैतानोंकी खुशामद क्यों करनी पड़े ? अपनी मानहावि क्यों करानी पड़े ? परमात्मा इन शैतानोंसे बचावे ! एक तो नातजख्मेकार और तंगदिल लोग वैसे ही शैतान होते हैं, पर जब उन पर दौलतका नशा चढ़ जाता है, तब तो उनकी शैतानीका ठिकाना ही क्या ? उस्ताद औरू कहते हैं और खूब कहते हैं—

नशा दौलत का बद अतवार को, जिस आन चढ़ा ।

सर पै शैतानके, एक और भी शैतान चढ़ा ॥

अनुभव-विहोम और तंगदिल मनुष्य पर जिस समय दौलत का नशा चढ़ गया, तब मानो शैतानके सिर पर एक और शैतान चढ़ गया ।

जिते किसी बीज़की ज़रूरत नहीं, वह किसीकी खुशामद क्यों

( ८२ )

करेगा ? वह अपना भ्रान क्यों खोयेगा ? निस्सृहके लिये तो जगत् तिनके समान है । इसलिये, सुख चाहो तो इच्छाओंको त्यागो ।

अगर आप आशा, तृष्णा और इच्छा को न त्यागोगे, धनियोंके पीछे-पीछे फिरोगे, तो आपको सिवा मानहानि और बे-इज्जतीके कुछ भी न मिलेगा ; पर यदि आप कुछ भी इच्छा न रखेंगे, किसीके भी पास न फटकागे तो दुनिया आपकी खुशामद करेगी, आपकी पूजा-प्रतिष्ठा करेगी और लक्ष्मी आपकी चैरी होकर आपके कदमोंमें पड़ी रहेगी । किसीके ठीक ही कहा है :—

भागती फिरती थी दुनिया, जब तलब करते थे हम ।

अब जो नफरत हमने की, तो बेक़रार आनेको है ॥

दोहा ।

भूमि शयन बरकल वसन, फल भोजन जल पान ।

धनसदमाते नरन को, कौन सहत अहमान ? ॥२२॥

22. While there is plenty of fruit to eat, delicious water to drink, the surfaces of the earth to sleep upon and the bark of trees to wear, we should not care to bear the taunts of evil-minded persons whose senses have all been taken prisoner by newly-got wealth.

तलब करना=डुलाना । नफरत=दुष्प्रा । बेक़रार=बेचैन । भूमि=त्रभूमि । शयन=सोना । बरकल=डाल । वसन=कपड़ा । अहमान=अभिमान-पूर्ण बातें ।

( ८३ )

विपुलहृदयैर्धन्यैः कैश्चिज्जगज्जनितं पुरा ।

विद्युतमपरेर्दत्तं चान्यैर्विजित्य तृणं यथा ।

इह हि भुवनान्यन्ये धीराश्चतुर्दश भुञ्जते ।

कतिपयपुरस्वाम्ये पुंसां क एष मद्भ्यः ॥ २३ ॥

कोई तो ऐसे बड़े दिलवाले लोग हुए, जिन्होंने प्राचीनकालमें इस जगत्की रचना की ; कुछ ऐसे हुए जिन्होंने इस जगत्को अपनी भुजाओं पर धारण किया ; कुछ ऐसे हुए जिन्होंने समग्र पृथ्वी जीती और फिर तुच्छ समझकर दूसरोंको दान कर दी ; और कुछ ऐसे भी हैं जो चौदह भुवनका पालन करते हैं । जो लोग, थोड़ेसे गाँवोंके मालिक होकर, अभिमानके ज्वरसे मतवाले हो जाते हैं, उनके सम्बन्धमें हम क्या कहें ? २३ ॥

इस जगत्में ऐसे लोग भी हुए, जिन्होंने जगत्की रचना कर डाली, पर उन्हें जरा भी अभिमान न हुआ । कुछ ऐसे लोग भी हुए, जिन्होंने इसे अपनी भुजाओं पर रखवा, पर अभिमान न किया । कुछ ऐसे हुए, जिन्होंने सारी दुनियाँको जीत लिया और फिर तुच्छ समझ कर दान भी कर दिया, पर उन्हें अभिमान न हुआ । कोई ऐसे हैं, जो इस संसारका पालन करते और इस पर आधिपत्य रखते हैं, पर उन्हें जरा भी घमण्ड नहीं । फिर वे लोग जो चन्द्र गाँवोंके मालिक बन जाते हैं, घमण्डके मारे क्यों पेड़ने लगते हैं ?

( ८४ )

संज्ञन लोग धनैश्वर्य और प्रभुता पाकर कभी अहङ्कार नहीं करते ; ओछे या नीच ही थोड़ीसी विषय-सम्पत्ति पाकर अभिमान किया करते हैं । नीति-रक्षमें लिखा है :—

दिव्यं चूतरसं पीत्वा, न गर्वं याति क्रोकिः ।

पीत्वा कर्दमपानीयं, भेको सकमकायते ॥

अगाधजलसञ्चारी, न गर्वं याति रोहितः ।

अंगुष्ठोदकमानेण, सकरी फरमायते ॥

उत्तम रसालके रसको पीकर क्रोकिः गर्वं नहीं करता, किन्तु वीचड़-मिला पानी पीकर ही भेड़क टरटराया करता है ।

अगाध जलमें रहनेवाली रोहित मछली गर्वं नहीं करती, किन्तु अंगुष्ठे जितने जलमें सकरी मछली खुशीसे नाचती फिरती है ।

बस ; छोटे और बड़े, पूरे और ओछे लोगोंमें यही अन्तर है । जो जितना छोटा है, वह उतना ही घमण्डी और उल्लकर चलनेवाला है और जो जितना ही बड़ा और पूरा है, वह उतना ही गम्भीर और निरभिमानी है । नदी नाळे थोड़ेसे जलसे इतना उठते हैं ; किन्तु सागर, जिसमें अनन्त जल भरा है, गम्भीर रहता है ।

अभिमान या अहंकार महा अनर्थोंका मूल है । यह नाशकी निशानी है । अहंकारीसे परमात्मा दूर रहता है ।

( ८५ )

जिससे परमात्मा दूर रहता है, उसके दुःखाँका अन्त कहाँ ? अतः मनुष्यो ! अभिमानको त्यागो । जो आज टुकड़ोंका मुहताज है, वह कल राजगद्दीका स्वामी दिखाई देता है और आज जिसके लिएपर राजमुकुट है, सम्भव है, कि. कल वह गली-गली मारा-मारा किरै । संसारकी यही गति है, इसलिये अभिमान बूथा है । परमात्माने एक-से-एक बढ़कर बना दिया है । कहा है :—

एक-एक से एक-एक को, बढ़कर बना दिया ।

दारा किसीको, किसी को सिकन्दर बना दिया * ॥

आपको किस बातका गर्व है ? यह राज्य और धन-दौलत क्या सदा आपके कुलमें रहेंगे या आपके साथ जायेंगे ? जो रावण दण्डिश्चर था, जिसने यक्ष, किन्नर, गन्धर्व और देवताओं तकको अपने अधीन कर लिया था, आज वह कहाँ है ? उसका धन-वैभव क्या उसके साथ गया ? जिस रामने समुद्रका पुल बाँधकर, बानर-सेनासे रावणका नाश किया, वही

ॐ दारा ईरानका वादशाह था । वह अपने समयमें मध्यवहके मालीयडकी तरह तपता था । उसने बहुत्तसे देश जीत लिये । किसीको उन्मीद न थी कि, दारा भी किसीसे पराजित होगा ; पर ईश्वरने तो एकसे एक बढ़ कर बनाये हैं । उसने दाराको भी परास्त करनेवाला सिकन्दर पैदा कर दिया । सिकन्दर आजमने दाराको शिकस्त दी और भारत पर भी चढ़ाई की ।

( २६ )

राम आज कहाँ है ? जिस बालिने रावण जैसे त्रिलोक-विजयी को अपने पुत्रके पाठनेसे बाँध रखा था, आज वह बालि कहाँ है ? जिस सहस्रबाहुने रावणके सिरपर चिराग रखकर अलंकारा था, वह सहस्रबाहु ही आज कहाँ है ? वारो दिशाओंको अपने भुजबलसे जीतनेवाले भीमाज्जुन आज कहाँ है ? हरिश्चन्द्र, कर्ण और बलिसे दानी आज कहाँ है ? इस पृथ्वीपर अनेक एक-से-एक बली राजा और शूरवीर हो गये, पर यह पृथ्वी किसीके साथ न गई । क्या आपकी धन-दौलत-जभीन्द्रारी या राजलक्ष्मी अटल और स्थिर है ? क्या यह आपके साथ जायगी ? हरगिज़ नहीं । आप जिस तरह खाली हाथ आये थे, उसी तरह खाली हाथ जायेंगे ।

अभिमानियोंका नशा उतारनेके लिये उस्ताद जौकने भी खूब कहा है :—

दिखा न जोशो खरोश इतना, जोर पर चढ़ कर ।

गये जहान में दरिया, बहुत उतर—चढ़ कर ॥

हे मनुष्य ! जोर में आकर इतना जोश-खरोश न दिखा ; इस दुनिया में बहुत से दरिया चढ़-चढ़ कर उतर गये,— कितने ही बाग लगे और सूख गये ।

महात्मा कबीरदासजी कहते हैं—

धरती करते एक पग, करते समन्दर फाल ।

हाथों परवत तोलते, ते भी खाये काल ॥

( ८७ )

हाथों परवत फाड़ते, समुन्दर घूँट भराय ।

ते सुनिवर धरती गले, कहा कोई गर्व कराय ?॥

छप्पय ।

भये जगत में धन्य ! धीर, जिन जगत रच्यो है ।

काहू धारी शीश, अजों वह नाहिं लच्यो है ॥

काहू दीनो दान, जीत काहू बस कीनो ।

भुवन चतुर्दश भोग कियो, काहू जस लीनो ॥

इमि अधिक एक सों एक से, तुम हो तिनमें तुच्छवित ।

दश बीस नगरके तृपति हवैं, यह मदको ज्वर तोहि कित? ॥ २ ॥

23 There were many large-hearted people in the past who helped in the early creation of the world. There were others who maintained it by the force of their arms and still others who won the whole earth and then gave it away to the needy valuing it no better than a straw. There are some even now in this world who enjoy the overlordship of the fourteen regions. What should we say of the fever of vanity contracted by persons who won only a few villages ?

त्वं राजा वयमन्युपासितगुरुभक्षामिमानोक्ताः

ख्यातस्त्वं विभवेयंशांसि कवयो दिक्षु प्रतन्वन्ति नः ।

रच्यौ = रचना की । काहू = किसोंने । धारी = धारण को । शीश = सिर पर । अजों = अबतक । लच्यौ = मुका । भुवन चतुर्दश = चौदह भुवन । जस = यश । इमि = इस तरह । भे = हुए । तिनमें = उनमें । छवित = नाचोड़ । तोहि = तुम्हें ।

( ८८ )

इत्थं मानन्द नातिदूरमुभयोरप्यावयोरन्तरं ययस्मासु पराङ्मुखोऽसिवयस्येकान्ततो निःस्पृहाः ॥२४॥

अगर तू राजा है, तो हम भी गुरुकी सेवासे सीखी हुई विद्याके अभिमानसे बड़े हैं। अगर तू अपने धन और वैभवके लिये प्रसिद्ध है, तो कवियोंने हमारी विद्याकी कीर्ति भी चारों ओर फैला रखी है। हे मानभञ्जन करनेवाले, तुम्हमें और हममें ज़ियादा फर्क नहीं है। अगर तू हमारी ओर नहीं देखता, तो हमें भी तेरी परवा नहीं है ॥२४॥

अगर तुम्हें अपने बल और धन का अभिमान है, तो हमें भी अपनी विद्या का अभिमान है। तुम्हमें और हममें कोई बड़ा भेद नहीं है। यदि तुम्हें हमारी ज़रूरत नहीं है, तो हमें भी तेरी ज़रूरत नहीं है, क्योंकि हमें तुम्हसे कुछ लेना नहीं।

क्षयय ।

तुम पृथ्वीपति भुम, भरे अभिमान विराजत ।

हम पाईं गुरु-गोह बुद्धि, बल ताके गाजत ।

तुम धनसों विख्यात, सुकवि गावत कहतु पावत ।

हम यशसों विख्यात, रहत निश धोस पढ़ावत ।

तुम हमहि बीच अन्तर बजौ, देखो सोच विचार चित ।

एते पर जो मुख फेरहो, तौ हमको एकान्तहित ॥२४॥

पृथ्वीपति=राजा । गुरु-गोह=गुरुके घर । गाजत=गरजते हैं ! विख्यात

( ८२ )

24. If thou art a king, we too are great in our pride of knowledge learnt by serving our teacher. If thou art famous for the power and riches, the poets have proclaimed the fame of our knowledge far and wide. Thus O thou ? who dost not honour anybody, there is not much difference between us both. If thou dost not care to look towards us, we too are absolutely without any desire to court thy attention.

असुक्तार्यां यस्यां ज्ञापपि न यातं नृपयतै-

सुवस्तस्या लाभे क इव बहुमानः क्षितिभुजाप् ।

तदंशस्याप्यंशे तदवयवलेखेऽपि पतयो

विषादे कर्तव्ये विदधति जडाः प्रत्युत सुदृष्ट ॥२५॥

सैकड़ों हजारों राजा इस पृथ्वीका अपनी-अपनी कहकर चले गये, पर यह किसी की भी न हुई ; तब राजा लोग इसके स्वामी होनेका वमबड क्यों करते हैं ? दुःखकी बात है, कि छोटे-छोटे राजा छोटे-से-छोटे टुकड़ेके मालिक होकर अभिमानके मारे फ़ले नहीं समाते ! जिस बातसे दुःख होना चाहिये, मूर्ख उससे उल्टे खुश होते हैं ॥२५॥

इस पृथ्वी पर रावण और सहस्रबाहु प्रभृति एक-से-एक बढ़कर राजा हो गये, जिन्होंने त्रिलोकी अपनी अङ्गुली पर नचा डाली । वे कहते थे, कि हमारे बराबर जगत्में दूसरा कोई नहीं

—प्रसिद्ध । इक्वि = उत्तम कवि । निशद्यौस = रातदिन । अन्तर = फर्क । पुतेपर = इतने पर भी । मुखफेर हो = मुँह फेरोगे ।

( ६० )

है। यह पृथ्वी मृदा हमारे ही पास रहेगी। पर वे सब एक दिन इसे छोड़कर चलें वसे; यह उनकी न हुई; वे इसे सदा न भोग सकें। तब आजकालके छोटे-छोट राजा, जो अपने तर्ज पृथ्वीपति समझ कर अभिमानके नरोमें चूर रहते हैं, इसके लिये लड़ते हैं, खून-खराबी करते हैं, क्या यह उनकी अज्ञानता नहीं है? उनकी यह छोटी सी प्रभुता—मलिकाई सदा-सर्वदा न रहेगी; यह बिजली कीसी बमक और बादल कीसी छाया है। इस पर घमण्ड करना बड़ी भूलकी बात है। महात्मा कबीर कहते हैं :—

चहुँदिशि पाका कोठ था, मन्दिर नगर मैकार ।

खिरकी-खिरकी पाहर, गज बन्धा दरबार ॥

चहुँदिशि तो योद्धा खड़े, हाथ लिये हथियार ।

सब ही यह तन देखता, काल ले गया मार ॥

आस-पास योद्धा खड़े, सबै बजावे गाल ।

मम्भ महल ते ले चला, ऐसा परवल काल ॥

हे मनुष्य ! मौतसे डर, अभिमान त्याग। किसी राजाकी नगरीके चारों तरफ पक्की शहरपनाह थी, उसका महल शहरके बीचों-बीच था, हरेक फाटककी खिड़की पर पहरेदार थे, दरबारमें हाथी बैधाया, चारों तरफ सुसज्जा सिपाही-हथियार बाँधे हुए खड़े थे। आस-पास खड़े हुए योद्धा गाल बजाते ही रह गये और वह बलवान काल, ऐसा बन्दोबस्त होनेपर भी,

( ६७ )

of battles. These small and narrow-minded kings are waited upon by needy whose mind are always in suspense whether they will be given something or not. Fie on the mean persons who hope to get a little bounty from such givers who are so small and poor in heart themselves.

न नट न विटा न गायना न परद्रेहनिबद्धुद्वयः ।

नृपसम्भनि नास के वयं कुचभारानमिता न योषितः ॥२७॥

न तो हम नट या बाजीगर हैं, न हम नचये-गवये हैं, न हमका जुगलखोरी आती है, न हमें दूसरों की कर्वादी की बन्दिशें बाँधनी आती हैं और न हम स्तनभारावनत खियाँ ही हैं ; फिर हमारी पूछ राजाओंके यहाँ क्यों होने लगी? ॥ २७ ॥

राजाओंके दरबारोंमें नटों, बाजीगरों, नाचने-गाने वालों तथा पराये नाशकों तद्वीरि करनेवालों, जुगलखोरी करनेवालों, इधर-की-उधर लगानेवालों अथवा ऐसी सुन्दरियोंकी पूछ होती है, जो रूपवती हैं और जिनकी कमर उनके स्तनोंके भारसे लची जाती है—हममें इनमेंसे एक भी बात नहीं, फिर हमारा प्रवेश राजसभामें कैसे हो सकता है? वहाँ तो उन्हींकी पूछ है—उन्हींका आदर है—जो उनकी विषय-वासनाएँ पूरी करते हैं।

दोहा ।

नट भट विट गायन नहीं, नाहिं वादिन के माहिं ।

कौन भाँति भूपति मिलन, तरुणी भी हम नाहिं ? ॥२७॥

नट = कलाबाज, नाचनेवाला । भट = योद्धा । विट = कुटना, रोंड

( २८ )

27. We are neither jugglers nor dancers or musicians, nor are our minds well-versed in scheming other people's fall. We are not even women walking low with the burden of their breasts. Then what should be our business in the palaces of kings who welcome only such persons as are ready to help them in gratifying their desires ?

पुरा विद्वत्तासीऽदुपशमवतां क्लेशहतये गता कालेनासौ विषयसुखसिद्धैष विषयिणाम् । इदानीं तु प्रेक्ष्य चित्तितलसुजः शास्त्रविमुखा नहो कष्टं साऽपि प्रतिदिनभयोऽथः प्रविशति ॥२८॥

पहले समयोंमें, विद्या केवल उन लोगोंके लिये थी, जो मानसिक क्लेशोंसे छुटकारा पाकर चित्तकी शान्ति चाहते थे। इसके आद विषय-सुख चाहने वालोंके कामकी हुई। अब तो राजा लोग शास्त्रोंको सुनना ही नहीं चाहते; वे उससे पराङ्मुख हो गये हैं; इसलिये वह दिन-ब-दिन रसातल को चली जाती है। यह बड़े ही दुःखकी बात है ! ॥२८॥

पहले जमानेमें, जो विद्या शान्तिकामी लोगोंके अशान्त चित्तोंको शान्त करने, उनकी मनोवेदनाओंको दूर करने और उनको शोक-तापकी आगमें जलनेसे बचानेके काम आती थी,

मिलानेवाला। गायन = गवैया। बादी = चुगलखोर। भूपति = राजा। वस्त्री = जवान शौरत।

( ६६ )

होते-होते वही विद्या विषय-सुख भोगनेका जुरिया हो गई । लोग भाँति-भाँतिकी विद्यायें स्वीकार राजाओं और धनियोंको खुश करते और उनसे धन पाकर स्वयं विषय-सुख भोगते थे । यहाँ तक तो ख़ैर थी ; किन्तु अब राजा लोग ऐसे हो गये हैं कि, वह विद्या और विद्वानोंकी ओर नज़र उठाकर भी नहीं देखते, पण्डितोंसे धर्मशास्त्र नहीं सुनते ; इसलिये अब कोई विद्या नहीं पढ़ता । क्रूर न होनेसे, विद्या अब अधोगतिको प्राप्त होती जाती है । क्या यह दुःखका विषय नहीं है ?

दोहा ।

विद्या दुखनाशक हती, फेरि विषय-सुख दीन ।

जात रसातल को चली, देखि रुपन्ह मतिहीन ॥२८॥

28 Formerly learning was only meant for the pacification of the mental troubles of those who longed for peace of mind alone. Later on, it became an instrument for pleasure-seeking persons to gain the objects of their pleasure. Now-a-days the kings having become unmindful of listening to the holy books which were expounded to them by learned men it is painful to think that the same learning is daily sinking down and down into oblivion.

हती=थी । फेरि=फिर । दीन=दिये । रसातल=पाताल । रुपन्ह=राजाओंको । मतिहीन=निर्दुद्धि ।