भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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जिससे परमात्मा दूर रहता है, उसके दुःखाँका अन्त कहाँ ? अतः मनुष्यो ! अभिमानको त्यागो । जो आज टुकड़ोंका मुहताज है, वह कल राजगद्दीका स्वामी दिखाई देता है और आज जिसके लिएपर राजमुकुट है, सम्भव है, कि. कल वह गली-गली मारा-मारा किरै । संसारकी यही गति है, इसलिये अभिमान बूथा है । परमात्माने एक-से-एक बढ़कर बना दिया है । कहा है :—

एक-एक से एक-एक को, बढ़कर बना दिया ।

दारा किसीको, किसी को सिकन्दर बना दिया * ॥

आपको किस बातका गर्व है ? यह राज्य और धन-दौलत क्या सदा आपके कुलमें रहेंगे या आपके साथ जायेंगे ? जो रावण दण्डिश्चर था, जिसने यक्ष, किन्नर, गन्धर्व और देवताओं तकको अपने अधीन कर लिया था, आज वह कहाँ है ? उसका धन-वैभव क्या उसके साथ गया ? जिस रामने समुद्रका पुल बाँधकर, बानर-सेनासे रावणका नाश किया, वही

ॐ दारा ईरानका वादशाह था । वह अपने समयमें मध्यवहके मालीयडकी तरह तपता था । उसने बहुत्तसे देश जीत लिये । किसीको उन्मीद न थी कि, दारा भी किसीसे पराजित होगा ; पर ईश्वरने तो एकसे एक बढ़ कर बनाये हैं । उसने दाराको भी परास्त करनेवाला सिकन्दर पैदा कर दिया । सिकन्दर आजमने दाराको शिकस्त दी और भारत पर भी चढ़ाई की ।