वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 181, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( २६ )
राम आज कहाँ है ? जिस बालिने रावण जैसे त्रिलोक-विजयी को अपने पुत्रके पाठनेसे बाँध रखा था, आज वह बालि कहाँ है ? जिस सहस्रबाहुने रावणके सिरपर चिराग रखकर अलंकारा था, वह सहस्रबाहु ही आज कहाँ है ? वारो दिशाओंको अपने भुजबलसे जीतनेवाले भीमाज्जुन आज कहाँ है ? हरिश्चन्द्र, कर्ण और बलिसे दानी आज कहाँ है ? इस पृथ्वीपर अनेक एक-से-एक बली राजा और शूरवीर हो गये, पर यह पृथ्वी किसीके साथ न गई । क्या आपकी धन-दौलत-जभीन्द्रारी या राजलक्ष्मी अटल और स्थिर है ? क्या यह आपके साथ जायगी ? हरगिज़ नहीं । आप जिस तरह खाली हाथ आये थे, उसी तरह खाली हाथ जायेंगे ।
अभिमानियोंका नशा उतारनेके लिये उस्ताद जौकने भी खूब कहा है :—
दिखा न जोशो खरोश इतना, जोर पर चढ़ कर ।
गये जहान में दरिया, बहुत उतर—चढ़ कर ॥
हे मनुष्य ! जोर में आकर इतना जोश-खरोश न दिखा ; इस दुनिया में बहुत से दरिया चढ़-चढ़ कर उतर गये,— कितने ही बाग लगे और सूख गये ।
महात्मा कबीरदासजी कहते हैं—
धरती करते एक पग, करते समन्दर फाल ।
हाथों परवत तोलते, ते भी खाये काल ॥