भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ८४ )

संज्ञन लोग धनैश्वर्य और प्रभुता पाकर कभी अहङ्कार नहीं करते ; ओछे या नीच ही थोड़ीसी विषय-सम्पत्ति पाकर अभिमान किया करते हैं । नीति-रक्षमें लिखा है :—

दिव्यं चूतरसं पीत्वा, न गर्वं याति क्रोकिः ।

पीत्वा कर्दमपानीयं, भेको सकमकायते ॥

अगाधजलसञ्चारी, न गर्वं याति रोहितः ।

अंगुष्ठोदकमानेण, सकरी फरमायते ॥

उत्तम रसालके रसको पीकर क्रोकिः गर्वं नहीं करता, किन्तु वीचड़-मिला पानी पीकर ही भेड़क टरटराया करता है ।

अगाध जलमें रहनेवाली रोहित मछली गर्वं नहीं करती, किन्तु अंगुष्ठे जितने जलमें सकरी मछली खुशीसे नाचती फिरती है ।

बस ; छोटे और बड़े, पूरे और ओछे लोगोंमें यही अन्तर है । जो जितना छोटा है, वह उतना ही घमण्डी और उल्लकर चलनेवाला है और जो जितना ही बड़ा और पूरा है, वह उतना ही गम्भीर और निरभिमानी है । नदी नाळे थोड़ेसे जलसे इतना उठते हैं ; किन्तु सागर, जिसमें अनन्त जल भरा है, गम्भीर रहता है ।

अभिमान या अहंकार महा अनर्थोंका मूल है । यह नाशकी निशानी है । अहंकारीसे परमात्मा दूर रहता है ।