भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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विपुलहृदयैर्धन्यैः कैश्चिज्जगज्जनितं पुरा ।

विद्युतमपरेर्दत्तं चान्यैर्विजित्य तृणं यथा ।

इह हि भुवनान्यन्ये धीराश्चतुर्दश भुञ्जते ।

कतिपयपुरस्वाम्ये पुंसां क एष मद्भ्यः ॥ २३ ॥

कोई तो ऐसे बड़े दिलवाले लोग हुए, जिन्होंने प्राचीनकालमें इस जगत्की रचना की ; कुछ ऐसे हुए जिन्होंने इस जगत्को अपनी भुजाओं पर धारण किया ; कुछ ऐसे हुए जिन्होंने समग्र पृथ्वी जीती और फिर तुच्छ समझकर दूसरोंको दान कर दी ; और कुछ ऐसे भी हैं जो चौदह भुवनका पालन करते हैं । जो लोग, थोड़ेसे गाँवोंके मालिक होकर, अभिमानके ज्वरसे मतवाले हो जाते हैं, उनके सम्बन्धमें हम क्या कहें ? २३ ॥

इस जगत्में ऐसे लोग भी हुए, जिन्होंने जगत्की रचना कर डाली, पर उन्हें जरा भी अभिमान न हुआ । कुछ ऐसे लोग भी हुए, जिन्होंने इसे अपनी भुजाओं पर रखवा, पर अभिमान न किया । कुछ ऐसे हुए, जिन्होंने सारी दुनियाँको जीत लिया और फिर तुच्छ समझ कर दान भी कर दिया, पर उन्हें अभिमान न हुआ । कोई ऐसे हैं, जो इस संसारका पालन करते और इस पर आधिपत्य रखते हैं, पर उन्हें जरा भी घमण्ड नहीं । फिर वे लोग जो चन्द्र गाँवोंके मालिक बन जाते हैं, घमण्डके मारे क्यों पेड़ने लगते हैं ?