वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ८२ )
करेगा ? वह अपना भ्रान क्यों खोयेगा ? निस्सृहके लिये तो जगत् तिनके समान है । इसलिये, सुख चाहो तो इच्छाओंको त्यागो ।
अगर आप आशा, तृष्णा और इच्छा को न त्यागोगे, धनियोंके पीछे-पीछे फिरोगे, तो आपको सिवा मानहानि और बे-इज्जतीके कुछ भी न मिलेगा ; पर यदि आप कुछ भी इच्छा न रखेंगे, किसीके भी पास न फटकागे तो दुनिया आपकी खुशामद करेगी, आपकी पूजा-प्रतिष्ठा करेगी और लक्ष्मी आपकी चैरी होकर आपके कदमोंमें पड़ी रहेगी । किसीके ठीक ही कहा है :—
भागती फिरती थी दुनिया, जब तलब करते थे हम ।
अब जो नफरत हमने की, तो बेक़रार आनेको है ॥
दोहा ।
भूमि शयन बरकल वसन, फल भोजन जल पान ।
धनसदमाते नरन को, कौन सहत अहमान ? ॥२२॥
22. While there is plenty of fruit to eat, delicious water to drink, the surfaces of the earth to sleep upon and the bark of trees to wear, we should not care to bear the taunts of evil-minded persons whose senses have all been taken prisoner by newly-got wealth.
तलब करना=डुलाना । नफरत=दुष्प्रा । बेक़रार=बेचैन । भूमि=त्रभूमि । शयन=सोना । बरकल=डाल । वसन=कपड़ा । अहमान=अभिमान-पूर्ण बातें ।