भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ८१ )

जबकि भगवान् ने हमारे लिये खानेको फल-ही-फल पैदा कर दिये हैं, पीनेको जगह-जगह मीठा और शीतल जल भर दिया है, पहनने के लिये दरख्तों को छाल पैदा कर दी है; फिर क्या ज़रूरत, जो हम धनसे मतवाले लोकोके ताने और कटोर बचन सहेँ ?

मनुष्यको सन्तोष नहीं, उसे तुष्णा नहीं छोड़ती ; इसीसे वह विषयोंके भोगनेकी लालसा से धनियों की खुशामद करता है, उनकी टेढ़ी-सूथी सुनता है, अपनी प्रतिष्ठा खोता है, निरादर और अपमान सहता है। अगर वह सन्तोष कर ले, तो उसे ऐसे दुष्टों और धन-मदसे मतवाले शैतानोंकी खुशामद क्यों करनी पड़े ? अपनी मानहावि क्यों करानी पड़े ? परमात्मा इन शैतानोंसे बचावे ! एक तो नातजख्मेकार और तंगदिल लोग वैसे ही शैतान होते हैं, पर जब उन पर दौलतका नशा चढ़ जाता है, तब तो उनकी शैतानीका ठिकाना ही क्या ? उस्ताद औरू कहते हैं और खूब कहते हैं—

नशा दौलत का बद अतवार को, जिस आन चढ़ा ।

सर पै शैतानके, एक और भी शैतान चढ़ा ॥

अनुभव-विहोम और तंगदिल मनुष्य पर जिस समय दौलत का नशा चढ़ गया, तब मानो शैतानके सिर पर एक और शैतान चढ़ गया ।

जिते किसी बीज़की ज़रूरत नहीं, वह किसीकी खुशामद क्यों