भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ८८ )

इत्थं मानन्द नातिदूरमुभयोरप्यावयोरन्तरं ययस्मासु पराङ्मुखोऽसिवयस्येकान्ततो निःस्पृहाः ॥२४॥

अगर तू राजा है, तो हम भी गुरुकी सेवासे सीखी हुई विद्याके अभिमानसे बड़े हैं। अगर तू अपने धन और वैभवके लिये प्रसिद्ध है, तो कवियोंने हमारी विद्याकी कीर्ति भी चारों ओर फैला रखी है। हे मानभञ्जन करनेवाले, तुम्हमें और हममें ज़ियादा फर्क नहीं है। अगर तू हमारी ओर नहीं देखता, तो हमें भी तेरी परवा नहीं है ॥२४॥

अगर तुम्हें अपने बल और धन का अभिमान है, तो हमें भी अपनी विद्या का अभिमान है। तुम्हमें और हममें कोई बड़ा भेद नहीं है। यदि तुम्हें हमारी ज़रूरत नहीं है, तो हमें भी तेरी ज़रूरत नहीं है, क्योंकि हमें तुम्हसे कुछ लेना नहीं।

क्षयय ।

तुम पृथ्वीपति भुम, भरे अभिमान विराजत ।

हम पाईं गुरु-गोह बुद्धि, बल ताके गाजत ।

तुम धनसों विख्यात, सुकवि गावत कहतु पावत ।

हम यशसों विख्यात, रहत निश धोस पढ़ावत ।

तुम हमहि बीच अन्तर बजौ, देखो सोच विचार चित ।

एते पर जो मुख फेरहो, तौ हमको एकान्तहित ॥२४॥

पृथ्वीपति=राजा । गुरु-गोह=गुरुके घर । गाजत=गरजते हैं ! विख्यात