वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
( ८८ )
इत्थं मानन्द नातिदूरमुभयोरप्यावयोरन्तरं ययस्मासु पराङ्मुखोऽसिवयस्येकान्ततो निःस्पृहाः ॥२४॥
अगर तू राजा है, तो हम भी गुरुकी सेवासे सीखी हुई विद्याके अभिमानसे बड़े हैं। अगर तू अपने धन और वैभवके लिये प्रसिद्ध है, तो कवियोंने हमारी विद्याकी कीर्ति भी चारों ओर फैला रखी है। हे मानभञ्जन करनेवाले, तुम्हमें और हममें ज़ियादा फर्क नहीं है। अगर तू हमारी ओर नहीं देखता, तो हमें भी तेरी परवा नहीं है ॥२४॥
अगर तुम्हें अपने बल और धन का अभिमान है, तो हमें भी अपनी विद्या का अभिमान है। तुम्हमें और हममें कोई बड़ा भेद नहीं है। यदि तुम्हें हमारी ज़रूरत नहीं है, तो हमें भी तेरी ज़रूरत नहीं है, क्योंकि हमें तुम्हसे कुछ लेना नहीं।
क्षयय ।
तुम पृथ्वीपति भुम, भरे अभिमान विराजत ।
हम पाईं गुरु-गोह बुद्धि, बल ताके गाजत ।
तुम धनसों विख्यात, सुकवि गावत कहतु पावत ।
हम यशसों विख्यात, रहत निश धोस पढ़ावत ।
तुम हमहि बीच अन्तर बजौ, देखो सोच विचार चित ।
एते पर जो मुख फेरहो, तौ हमको एकान्तहित ॥२४॥
पृथ्वीपति=राजा । गुरु-गोह=गुरुके घर । गाजत=गरजते हैं ! विख्यात
( ८२ )
24. If thou art a king, we too are great in our pride of knowledge learnt by serving our teacher. If thou art famous for the power and riches, the poets have proclaimed the fame of our knowledge far and wide. Thus O thou ? who dost not honour anybody, there is not much difference between us both. If thou dost not care to look towards us, we too are absolutely without any desire to court thy attention.
असुक्तार्यां यस्यां ज्ञापपि न यातं नृपयतै-
सुवस्तस्या लाभे क इव बहुमानः क्षितिभुजाप् ।
तदंशस्याप्यंशे तदवयवलेखेऽपि पतयो
विषादे कर्तव्ये विदधति जडाः प्रत्युत सुदृष्ट ॥२५॥
सैकड़ों हजारों राजा इस पृथ्वीका अपनी-अपनी कहकर चले गये, पर यह किसी की भी न हुई ; तब राजा लोग इसके स्वामी होनेका वमबड क्यों करते हैं ? दुःखकी बात है, कि छोटे-छोटे राजा छोटे-से-छोटे टुकड़ेके मालिक होकर अभिमानके मारे फ़ले नहीं समाते ! जिस बातसे दुःख होना चाहिये, मूर्ख उससे उल्टे खुश होते हैं ॥२५॥
इस पृथ्वी पर रावण और सहस्रबाहु प्रभृति एक-से-एक बढ़कर राजा हो गये, जिन्होंने त्रिलोकी अपनी अङ्गुली पर नचा डाली । वे कहते थे, कि हमारे बराबर जगत्में दूसरा कोई नहीं
—प्रसिद्ध । इक्वि = उत्तम कवि । निशद्यौस = रातदिन । अन्तर = फर्क । पुतेपर = इतने पर भी । मुखफेर हो = मुँह फेरोगे ।
( ६० )
है। यह पृथ्वी मृदा हमारे ही पास रहेगी। पर वे सब एक दिन इसे छोड़कर चलें वसे; यह उनकी न हुई; वे इसे सदा न भोग सकें। तब आजकालके छोटे-छोट राजा, जो अपने तर्ज पृथ्वीपति समझ कर अभिमानके नरोमें चूर रहते हैं, इसके लिये लड़ते हैं, खून-खराबी करते हैं, क्या यह उनकी अज्ञानता नहीं है? उनकी यह छोटी सी प्रभुता—मलिकाई सदा-सर्वदा न रहेगी; यह बिजली कीसी बमक और बादल कीसी छाया है। इस पर घमण्ड करना बड़ी भूलकी बात है। महात्मा कबीर कहते हैं :—
चहुँदिशि पाका कोठ था, मन्दिर नगर मैकार ।
खिरकी-खिरकी पाहर, गज बन्धा दरबार ॥
चहुँदिशि तो योद्धा खड़े, हाथ लिये हथियार ।
सब ही यह तन देखता, काल ले गया मार ॥
आस-पास योद्धा खड़े, सबै बजावे गाल ।
मम्भ महल ते ले चला, ऐसा परवल काल ॥
हे मनुष्य ! मौतसे डर, अभिमान त्याग। किसी राजाकी नगरीके चारों तरफ पक्की शहरपनाह थी, उसका महल शहरके बीचों-बीच था, हरेक फाटककी खिड़की पर पहरेदार थे, दरबारमें हाथी बैधाया, चारों तरफ सुसज्जा सिपाही-हथियार बाँधे हुए खड़े थे। आस-पास खड़े हुए योद्धा गाल बजाते ही रह गये और वह बलवान काल, ऐसा बन्दोबस्त होनेपर भी,
( ६७ )
of battles. These small and narrow-minded kings are waited upon by needy whose mind are always in suspense whether they will be given something or not. Fie on the mean persons who hope to get a little bounty from such givers who are so small and poor in heart themselves.
न नट न विटा न गायना न परद्रेहनिबद्धुद्वयः ।
नृपसम्भनि नास के वयं कुचभारानमिता न योषितः ॥२७॥
न तो हम नट या बाजीगर हैं, न हम नचये-गवये हैं, न हमका जुगलखोरी आती है, न हमें दूसरों की कर्वादी की बन्दिशें बाँधनी आती हैं और न हम स्तनभारावनत खियाँ ही हैं ; फिर हमारी पूछ राजाओंके यहाँ क्यों होने लगी? ॥ २७ ॥
राजाओंके दरबारोंमें नटों, बाजीगरों, नाचने-गाने वालों तथा पराये नाशकों तद्वीरि करनेवालों, जुगलखोरी करनेवालों, इधर-की-उधर लगानेवालों अथवा ऐसी सुन्दरियोंकी पूछ होती है, जो रूपवती हैं और जिनकी कमर उनके स्तनोंके भारसे लची जाती है—हममें इनमेंसे एक भी बात नहीं, फिर हमारा प्रवेश राजसभामें कैसे हो सकता है? वहाँ तो उन्हींकी पूछ है—उन्हींका आदर है—जो उनकी विषय-वासनाएँ पूरी करते हैं।
दोहा ।
नट भट विट गायन नहीं, नाहिं वादिन के माहिं ।
कौन भाँति भूपति मिलन, तरुणी भी हम नाहिं ? ॥२७॥
नट = कलाबाज, नाचनेवाला । भट = योद्धा । विट = कुटना, रोंड
७
( २८ )
27. We are neither jugglers nor dancers or musicians, nor are our minds well-versed in scheming other people's fall. We are not even women walking low with the burden of their breasts. Then what should be our business in the palaces of kings who welcome only such persons as are ready to help them in gratifying their desires ?
पुरा विद्वत्तासीऽदुपशमवतां क्लेशहतये गता कालेनासौ विषयसुखसिद्धैष विषयिणाम् । इदानीं तु प्रेक्ष्य चित्तितलसुजः शास्त्रविमुखा नहो कष्टं साऽपि प्रतिदिनभयोऽथः प्रविशति ॥२८॥
पहले समयोंमें, विद्या केवल उन लोगोंके लिये थी, जो मानसिक क्लेशोंसे छुटकारा पाकर चित्तकी शान्ति चाहते थे। इसके आद विषय-सुख चाहने वालोंके कामकी हुई। अब तो राजा लोग शास्त्रोंको सुनना ही नहीं चाहते; वे उससे पराङ्मुख हो गये हैं; इसलिये वह दिन-ब-दिन रसातल को चली जाती है। यह बड़े ही दुःखकी बात है ! ॥२८॥
पहले जमानेमें, जो विद्या शान्तिकामी लोगोंके अशान्त चित्तोंको शान्त करने, उनकी मनोवेदनाओंको दूर करने और उनको शोक-तापकी आगमें जलनेसे बचानेके काम आती थी,
मिलानेवाला। गायन = गवैया। बादी = चुगलखोर। भूपति = राजा। वस्त्री = जवान शौरत।
( ६६ )
होते-होते वही विद्या विषय-सुख भोगनेका जुरिया हो गई । लोग भाँति-भाँतिकी विद्यायें स्वीकार राजाओं और धनियोंको खुश करते और उनसे धन पाकर स्वयं विषय-सुख भोगते थे । यहाँ तक तो ख़ैर थी ; किन्तु अब राजा लोग ऐसे हो गये हैं कि, वह विद्या और विद्वानोंकी ओर नज़र उठाकर भी नहीं देखते, पण्डितोंसे धर्मशास्त्र नहीं सुनते ; इसलिये अब कोई विद्या नहीं पढ़ता । क्रूर न होनेसे, विद्या अब अधोगतिको प्राप्त होती जाती है । क्या यह दुःखका विषय नहीं है ?
दोहा ।
विद्या दुखनाशक हती, फेरि विषय-सुख दीन ।
जात रसातल को चली, देखि रुपन्ह मतिहीन ॥२८॥
28 Formerly learning was only meant for the pacification of the mental troubles of those who longed for peace of mind alone. Later on, it became an instrument for pleasure-seeking persons to gain the objects of their pleasure. Now-a-days the kings having become unmindful of listening to the holy books which were expounded to them by learned men it is painful to think that the same learning is daily sinking down and down into oblivion.
हती=थी । फेरि=फिर । दीन=दिये । रसातल=पाताल । रुपन्ह=राजाओंको । मतिहीन=निर्दुद्धि ।
( १०१ )
स जातः कोऽप्यासीन्यहनरिपुणा मूर्ध्नि धवलं
कपालं यस्योच्चेर्विनिहितमलंकारविधये ।
तृभिः प्राणत्राणप्रवणमतिभिः कैश्चिद्भुना
नमस्त्रिः कः पुंसामयमतुलदर्पञ्चरभः ॥२६॥
प्राचीन कालमें ऐसे पुरुष हुए हैं, जिनकी खोपड़ियोंकी माला बनाकर स्वयं शिवने शृंगारके लिये अपने गलेमें पहनी । अब ऐसे लोग हैं, जो अपनी जीविका-निर्वाहके लिये सलाम करने वालोंसे ही प्रतिष्ठा पाकर, अभिमानके ज्वर ( मद ) से गरम हो रहे हैं ॥२६॥
दोहा ।
ऐसेहू जग में भये, मुण्डमाल शिव कीन ।
धनलोभी नर नवत लखि, तुमको मदज्वर दीन ॥२७॥
29. There have been even such great men before, that their skulls were made into a wreath and worn round his neck for the sake of adornment by the great Shiva Himself. What should we think of the boundless vanity of people who become so proud of their position now-a-days even if they are greeted respectfully by a few persons desirous of conducting their living somehow or other ?
अर्थानामीशिषे त्वं वयमपि च गिराभीरमहे यावदित्यं
शरस्त्वं वादिदर्पञ्चरशमनविधावन्नयं पाटवं नः ।
मुण्डमाल = मुण्डोंकी माला ; खोपड़ियोंकी माला । नवत लखि = कुकते हुए या सलाम करते हुए देखकर ।
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( १०१ )
सेवन्ते त्वां धनान्या मतिललहतये मामपि श्रोतुकामा
मध्यन्यास्या न चैतत्त्वयि मम सुतरामेष राजन्नातोऽस्मि ॥२०॥
यदि तुम धनके स्वामी हो, तो हम वार्णिके स्वामी हैं। यदि तुम युद्ध करनेमें वीर हो, तो हम अपने प्रतिपक्षियोंसे शास्त्रार्थ करके उनका मद-ज्वर तोड़ने में कुशल हैं। यदि तुम्हारी सेवा धन-कामी या धनान्ध करते हैं, तो हमारी सेवा अज्ञान-अन्धकारका नाश चाहनेवाले, शास्त्र सुननेके लिए करते हैं। यदि तुम्हें हमारी जरा भी गरज नहीं है, तो हमें भी तुम्हारी बिल्कुल गरज नहीं है। लो, हम भी चलते हैं ॥३०॥
छप्पय ।
तुम अवनी के ईश, ईश हमहूँ वार्णिके ।
तुम हौ रण में धीर, वीर गाढे अति जीके ।
ल्यौही विद्यावाद करत, हमहूँ नहिं हारे ।
प्रतिपक्षके मान मार, अपने विस्तारे ।
धन-लोभी नर सेवत तुम्हें, हमको शिव श्रोता भले ।
तुमको न हमारी चाह, तो हमहूँ ब्यासे उठ चले ॥३०॥
30. O king, if thou art the lord of the wealth, we too are the lord of speech. If thou art brave in fight, our pluck too is unans-
श्ववनी=पृथ्वी। इश=स्वामी। विद्यावाद=शास्त्रार्थ। प्रतिपक्षी=विपक्षी=मुखालिफ। श्रोता=घुनने वाले। ब्यासे=इसे जगहसे।
( १०२ )
werable in breaking down the vanity of our adversary in literary discussions. It thou art served by men hankering after wealth, we too are waited upon by people who are desirous of listening to our learned discourses for the sake of dispelling the ignorance from their minds. If thou dost not care for us, we too cherish no regard for thee. Look, we are off ?
यदा किञ्चिञ्जोऽहं द्विप इव मदान्यः समभवं
तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलितं मम मनः ।
यदा किंचिर्किंचिदुभजनसकाशादवगतं
तदा सूर्योऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः ॥३१॥
जब मैं बहुत थोड़ासा जानता था, तब हाथीके समान मदसे अन्ध्या हो रहा था ; मैं समझता था, कि मैं सर्वज्ञ हूँ । जब सुभे बुद्धिमानोंकी सुहृदत्ते कुछ मालूम हुआ ; तब मैंने समझा, कि मैं तो कुछ भी नहीं जानता । मेरा भूढ़ा मद ज्वरकी तरह उतर गया ॥३१॥
जो लोग बहुत थोड़ा ज्ञान रखते हैं, समझते हैं कि, हम सब जानते हैं—दुनियाकी सारी अबल हममें ही है, हमारे सिवा और सब पशु हैं । अल्पज्ञताके कारण उन्हें बड़ा घमण्ड रहता है ; किन्तु जब वे बुद्धिमान् और विद्वानोंकी सुहृदत्तमें आते हैं और कुछ सीख जाते हैं ; तब वे समझते हैं, कि हम तो कुछ भी नहीं जानते थे, हमारा अभिमान मिथ्या था । उस समय उनका अभिमान हवा हो जाता है ।
( १०३ )
उस्ताद जौकने भी ठीक ऐसी ही बात कही है :—
हम जानते थे, इल्म से कुछ जानेंगे ।
जाना तो यह जाना, कि न जाना कुछ भी ।
वाहटेयर नामक पाश्चात्य विद्वान्ने भी ऐसी ही बात कही है—“The more we have read, the more we have learned, the more we have medicated, the better conditioned we are to affirm that we know nothing.” अधिकाधिक पढ़ने, सीखने और विचारनेसे हमें कहना पड़ता है कि, हम तो कुछ भी नहीं जानते । किसी ने ठीक ही कहा है—“अक्ष विद्यो महागर्वी” थोड़ी विद्यावाला बहुत घमण्डी होता है । पर जब वह विद्वानोंकी संगतिसे और सीखता समझता है, तब उसका नशा किरकिरा हो जाता उसे मानना पड़ता है कि, मैं तो एकदम मूर्ख हूँ—मैं तो अभी कुछ भी नहीं जानता ।
छप्पय ।
जब हों समझौ नैक, तबहि सर्वज्ञ भयो हौ ।
जैसे गज सदमत्त, अंधता छाय गयो हौ ।
जब सतसंगति पाय, कछुक हों समझन लाग्यौ ।
तबहि भयो अति गूढ़, गर्व गुणको सब भाग्यौ ।
हों=मैं । नैक=थोड़ासा । सर्वज्ञ=सब जाननेवाला । गज=हाथी ।
( १०४ )
ज्वर-चर्दत-चर्दत अति ताप ज्यों; उत्तरत, सीतल होत तन ।
ल्योही मनकों मद उत्तरियों, लियों शील-सन्तोष-पन ॥३१॥
31. As long as I knew only very little I was blind with madness like an elephant and my mind was filled with the idea that I knew all. But when I came to learn a little by intercourse with wise men, my false conceit vanished away with the realisation that I knew nothing.
अतिकान्तः कालो लटभलनाभोगसुभगो
अमन्तः श्रान्ताः स्मः सुचिरमिह संसारसरणौ ।
इदानीं स्वःसिन्धोस्तदधुवि समाकन्दनगिरः
सुतौरैः फल्कौरैः शिवशिवशिवेति प्रतमुमः ॥३२॥
जेवरोसे सजी हुई स्त्रियोंके भोगने-योग्य जवानी चली गई ; और हम चिरकाल तक विषयोंके पीछे दौड़ते-दौड़ते थक भी गये । अब हम पवित्र जाहन्वी-तट पर, (ललचाने वाली) स्त्रियोंकी निन्दा करते हुए, शिव-शिव जपेंगे ॥३२॥
जिस पुरुषको, स्त्रियोंकी असलियत मालूम हो जानेसे, चिरकि हो गयी है ; वह कहता है—अब हमारी स्त्रियोंके भोगने-योग्य अवस्था—जवानी चली गई । अब वह लौटकर आयेगी नहीं, और यह बुढ़ापा जायगा नहीं । यह बला जवानोंमें ही
मदमत्त=मतवाला । कलुङ्ग=कुल्लू । हों=मैं । तबहि=तभी । सीतल=शीतल=ठण्डा । तन=शरीर । गर्वगुणको=विद्या या गुणका वृत्तगढ़ ।
( १०५ )
अच्छी लगती है—यह बीमारी जवानीमें ही जोर करती है। किसीने ठीक ही कहा है:—
इरकूका जोश है जब तक, कि जवानीके हैं दिन ।
यह यज्ञ करता है शिद्ध, इन्हीं अय्याममें खास ॥
अब तो बुढ़ापेका दौरदौरा है, इस उम्रमें हम नाज़नियोंके साथ ऐसा कर भी नहीं सकते। इसके सिवा, अब हम सावधान भी हो गये हैं। हमने बेवकूफ़ों छोड़ दी है। हम बहुत दिनोंतक विषयोंमें ठीन रहे, हमने बहुत कुछ विषय-भोग भोगे; अब हम उनसे थक गये, उनसे हमारा जी ऊब गया। उनसे हमें कुछ भी सुख नहीं मिला। इसलिये अब हम गङ्गा-जीके किनारे बैठकर, संसार-बन्धनकी मूल और नरकको नसेनी सुन्दरियोंकी ममता छोड़, शिवसे प्रीति करेंगे और दिन-रात उन्हींका पवित्र एवं कल्याणकारी नाम जपेंगे, जिससे हमारा अन्तकाल तो सुधर जाय।
दोहा ।
रमणकाल यौवन गयो, थक्यो अमृत संसार ।
देहूँ गंगतट शेष वय, शिव-शिव जपत विसार ॥३२॥
इरकू=प्रेम । मञ्जु=रोग । शिद्ध=जोर । अय्याम=दिन । रमणकाल=स्त्री-भोग करनेका समय । यौवन=जवानी । अमृत=भटकते-भटकते । गंगतट=गंगाके किनारे । शेष वय=बाकी उम्र ।
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32. The time of our youth, when we were fit for enjoying the company of jewel-bedecked women, has gone. We are tired of hankering after the pleasures of the world for a long time, Now we will pass our days on the holy banks of the heavenly Ganges cursing the misleading guiles of women and repeating the name of the Great Shiva in prayer.
माने म्लायिनि स्मृदिद्वे च वसुनि व्यर्थ प्रयातेऽर्थिनि
जीणे वन्धुजने गते परिजने नष्टे शनैर्थावने ।
शुक्तं केवलमेतदेव सुधियां यज्जहत्तुकन्यापयः-
पूतप्रावगिरीन्द्रकन्दरदुरीकुञ्जोनिवासः क्वचित् ॥ ३३ ॥
जब लोगोमें इज्जत-आनर न रहे; धन नाश हो जाय; याचक लौट-लौट कर जाने लगे; भाई-बन्धु, स्त्री-पुत्र और नाते-रिश्तेदार मर जायें; तब बुद्धिमानको चाहिए, कि किसी ऐसे पर्वत की गुहाके कोनेमें जा बसे, जिसके पत्थर गंगाजीके जलसे पवित्र हो रहे हों ॥३३॥
जब लोगोमें अपना मान न रहे, लोग नफ़रतकी नज़रसे देखने लगे, अपनी धन-दौलत जाती रहे; जो याचक पहले कुछ पाते थे, वे अब निर्धनताके कारण विमुख हो-होकर लौट आते हों; भाई-बन्धु और स्त्री-पुत्र प्रभृति नातेदार दूसरी दुनियाको बढे गये हों, तब तो बुद्धिमानको चाहिये कि संसारको त्याग दे; इसमें मोह न रखे और किसी ऐसे पहाड़की गुफामें जा
( १०७ )
रहे, जिसके पत्थरोंको पवित्र गङ्गाजल पखार-पखारकर पवित्र करता हो। ऐसी हालतमें, संसारमें रहना—धूषा समय खोना है। कम-से-कम उस समय तो बुद्धिमान् एकान्तमें बैठकर, सब तरहकी आशा-तृष्णा छोड़कर, भगवान्के चरणकमलोंमें मन लगावे।
दोहा ।
गयो मान यौवन सुधन, भिजुक जात निराश ।
अब तौ मोकों उचित यह, श्रीगंगा तट वास ॥३३॥
33. When all our respect has gone, our riches have flown away, when the poor and the needy who came to us for help before and were given what they wanted have begun to be sent away with refusal, when all our relations and dear ones have left this world, it is but desirable for a wise man to take up his abode somewhere in the corner of some mountain-cave whose stones are washed by the holy waters of the Ganges.
परेषां चेतांसि प्रतिदिवसमाराध्य बहुधा
प्रसादं किं नेतुं विशसि हृदयक्षेकलिलम् ॥
प्रसन्ने त्वय्यन्तः स्वयमुदितचिन्तामणि गुणे
विमुक्तः संकल्पः किमभिलषितं पुष्यति न ते ॥३४॥
हे मलिन मन ! तू पराये दिलको प्रसन्न करनेमें किसलिए लगा रहता है ? यदि तू तृष्णाको छोड़कर सन्तोष करले, अपने
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में ही सन्तुष्ट रहे, तो तू स्वयं चिन्तामणि-स्वरूप हो जाय । फिर तेरी कौनसी इच्छा पूरी न हो ? ॥३४॥
मन ही सब कामोंका कर्ता है । सभी इन्द्रियां मनके ही अधीन और मनकी ही अनुगामिनी हैं । मन ही बन्धन और मोक्षका कारण है । मनुष्य मनसे ही पाप-पुण्य और दुःख-सुख प्रभृतिका भागी होता है । मन ही मनुष्यको बुढ़ा-भला, साधु-असाधु सब कुछ बना देता है । मनकी वृत्ति सुधरनेसे ही, मनके वासना-हीन होनेसे ही, सब कुछ त्यागनेसे हो, वह आत्मसाक्षात्कारके योग्य हो जाता है ; इसी लिये कोई ज्ञानी पुरुष मनको सम्बोधन करके कहता है,—
“अरे मन ! तू स्वयं तो मलिन और दुःखके भारसे दबा हुआ है ; फिर तू औरोंके दिल खुश करनेकी इतनी कोशिशें क्यों करता है, क्यों आफूमें उडाता है, क्यों मान खोता है और क्यों अपमान सहता है ? इससे तुझे क्या लाभ होगा ? मेरी बात माने तो तू इच्छाको त्याग दे, किसी भी चीज़की इच्छा मत रख ; तब तुझे शान्ति मिलेगी—परमानन्दकी प्राप्ति होगी । जब तू चिन्तामणिकी भाँति स्वच्छ हो जायगा, जब तू अपने स्वरूपको पहचान जायगा ; तब तुझे आत्मसाक्षात्कार हो जायगा, तुझे ब्रह्मज्ञान हो जायगा, तू ब्रह्मके प्रेममें लीन हो जायगा, हर्ष-विषाद और शोक-मोह तेरे पास न आवेंगे, अष्ट-सिद्धि और नवनिद्धि तेरे सामने हाथ बाँधे खड़ी रहेंगी । उस समय तेरी कोई अभिलाषा पूरी हुए बिना बाकी न रहेगी ।
( २०६ )
इसी लिये कहता हूँ, कि तु दूसरोंको राजी करनेकी अपेक्षा अपने तर्क ही राजी कर, इससे तुझे निश्चय ही उसकी प्राप्ति होगी, जिसके समान त्रिलोकियोंमें और कोई नहीं है। जिस समय उसकी अनुपम छवि तेरी आँखोंमें समा जायगी, उस समय तुझे और कुछ अच्छा न लगेगा ; केवल वही अच्छा लगेगा। महाकवि रहीमने कहा है—
प्रीतम-छवि नयनन बसी, पर-छवि कहाँ समाय ।
भरी सराय “रहीम” लखि, आप पथिक फिर जाय ॥
जब आँखोंमें प्यारे कृष्णकी सुन्दर मनमोहिनी छवि समा जाती है, तब उनमें और किसीकी छवि समा नहीं सकती। जबतक नयनोंमें मुगली मनोहरकी छवि नहीं समाती, नयन उसकी छविसे खाली रहते हैं, तभीतक मामूली छवि उनमें समाती रहती है। जिस तरह सरायको भरी हुई देख कर, उसमें कोठरियाँ खाली न पाकर, मुसाफिर लौट जाते हैं ; उसी तरह नयनोंमें मनमोहनकी बाँकी छवि देखकर और संसारी मिथ्या खूबसूरतियाँ नयनोंके पास भी नहीं फटकतीं। जब दिलमें परम प्यारे कृष्णका डेरा लग जाता है, तब उसमें सुन्दरी कामिनियाँ और लक्ष्मी प्रभृति किसीको भी स्थान नहीं मिलता ; अर्थात् दिलको उसके मुकाबलेमें संसारके अच्छे-से-अच्छे पदार्थ—स्त्री-पुत्र और धन-दौलत प्रभृति—तुच्छातितुच्छ जँचते हैं।
( ११० )
मतलब यह है कि, मनुष्य अज्ञानतासे भटकता है, अलौक सुख पानेके लिये वृथा नीचांकी षुशामद करता है। जिस सुखके लिये वह इतनी आफूत उठाता है, उस सुखका सच्चा सोता स्वयं उसके दिलमें मौजूद है। किसी पाश्चात्य विद्वान्ने ए. व. कहा है—“The source of true happiness is inherent in the heart ; he is a fool who seeks it elsewhere” सच्चे सुखका सोता दिलके अन्दर मौजूद है। जो उसे अन्यत्र खोजता-फिरता है, वह मूर्ख है। निश्चय ही सुख मनमें है और मनके निरोधसे वह मिलता है। जिसका चित्त स्थिर है, उसे सदा सुख है ; जिसका चित्त स्थिर नहीं, उसे सुख नहीं ; अतः मनुष्यो ! भटकना छोड़कर सन्तोषकी शरण गहो ; निश्चय ही आपको अपने भीतर ही परम सुख-शान्ति मिलेगी।
दोहा ।
तूही रीक्षत क्यों नहीं, कहा रिक्षवत और ? ।
तेरेही आनन्दसे, चिन्तामणि सब ठौर ॥३४॥
34. O my unhappy mind, why dost thou try to enter into the hearts of others by doing thy utmost to please them while thou art thyself heavy with the burden of afflictions. If thou becomest contented by giving up thy desires, wilt not thou gain all thou wantest, when all the good qualities of a pure mind are produced within thyself like a Chintamani which has the power of giving everything that a man desires ?
( १११ )
भोगे रोगभयं कुलेच्छुतिभयं विते नृपालाङ्गयम् मौने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जरायाः भयम् । शास्त्रे वादभयं गुणैः खलभयं काये कृताताङ्गयं सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यभेवाभयम् ॥३५॥
विषयेके भोगनेमें रोगोंका डर है, कुलमें दोष होनेका भय है, धनमें राजका भय है, चुप रहनेमें दीनताका भय है, बलमें शत्रुओंका भय है, सौन्दर्यमें बुढ़ापे का भय है, शास्त्रोंमें विपत्तियोंके बाद का भय है, गुणोंमें दुष्टोंका भय है, शरीरमें मौतका भय है ; संसारकी सभी चीजोंमें मनुष्योंके भय है । केवल “वैराग्य”में किसी प्रकारका भय नहीं है ॥३५॥
यदि मनुष्य विषय-सुखोंको भोगता है, तो उसे रोगोंका भय रहता है । यदि चन्द्रन आदि शीतल पदार्थोंका लेपन किया जाता है, तो बाढ़ी हो जाती है । यदि स्त्रीसे मैथुन किया जाता है, तो बल घटता है और बहुत करनेसे क्षय रोग हो जाता है । यदि उच्च कुलमें जन्म होता है, तो सदा उसके पतन या उसमें कोई दोष होनेका डर लगा रहता है, क्योंकि कुलमें किसीके भी दुराचारी होनेसे कुलका नाम बदनाम हो जाता है अथवा प्लोग वगैरःके होनेसे कुलका नाम डूब ही जाता है । इसी तरह अधिक धन होनेसे राजाका डर लगा रहता है, कि कहीं राजा सारा धन न छीन ले । चुप
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रहनेमें अपतिष्ठा और दीनताका भय रहता है, क्योंकि सुषुप्त रहने वालेको सभी दीन-हीन समझ लेते हैं। संश्राममें शत्रुओं का भय रहता है। यदि सूरत सुन्दर होती है, तो सूरतके बिगड़ जानेका भय रहता है; बुढ़ापेमें रूप-रङ्ग नष्ट हो ही जाता है। शास्त्रोंके जानने वालेको प्रतिपक्षियोंका भय रहता है, क्योंकि प्रतिपक्षी सदा उसे नीचा दिखाना और उसका अपमान करना चाहते हैं। पुण्य या सद्गुणोंमें दुष्टोंका भय रहता है; दुष्ट लोग अच्छे-से-अच्छे कामोंमें दोष निकाल कर, उनका उद्घाटन अर्थ लगाने लगते हैं; वे निन्दा या अपवाद करके गुणीके गुणोंका मूल्य घटानेकी भरपूर चेष्टा किया करते हैं। शरीरको मृत्युका भय रहता है, क्योंकि कायाका नाश अवश्यभूामी है। जो शरीरमें आया है, जिसने यह शरीर रूपी वस्त्र पहना है; उसे अपना शरीर छोड़ना ही होगा—यह चोला बदलना और नया पहनना ही होगा।
इस तरह विचार करनेसे यही सिद्ध होता है, कि मनुष्य को सांसारिक सभी पदार्थोंमें भय-ही-भय है। फिर भय किसमें नहीं है? केवल “वैराग्य या त्याग अथवा संन्यास” ही ऐसा है, जिसमें किसी भी बातका भय नहीं है।
यों तो संसारमें जरा भी सुख नहीं—सर्वत्र भय-ही-भय है; पर दुष्ट और नीचोंका भय सबसे भारी है। दुष्टोंसे तंग होकर ही, महाकवि गालिब आदमियोंको वस्तीमें भी बसना पसन्द नहीं करते और कहते हैं:—
( ११३ )
रहिए अब ऐसी जगह चलकर, जहाँ कोई न हो ।
हमसखुन कोई न हो, और हमजवों कोई न हो ॥ १ ॥
वे दूरो दीवार सा, इक घर बनाना चाहिए ।
कोई हमसाथा न हो, और पासवों कोई न हो ॥ २ ॥
पड़िए गर बीमार, तो कोई न हो तीमारदार ।
और अगर भर जाइए, तो नोहावों कोई न हो ॥ ३ ॥
संसारमें जरा भी सुख नहीं है, सर्वत्र भय-ही-भय है । एक को एक खानेको दौड़ता है । जिसे देखो वही जला मरता है । यहाँ ईर्षा-द्वेषका बाजार जोरोंसे गर्म रहता है, इस वास्ते ऐसी जगहमें चलकर रहना चाहिये, जहाँ कोई न हो ; हमारी बात कोई न समझे और हम किसीकी न समझे । मकान भी ऐसा ही हो, जिसमें दरवाजे और दीवार न हों ; अर्थात् साफ जड़ल हो । न हमारा कोई साथी हो, न पड़ोसी ; अगर बीमार हो जायँ, तो कोई खबर लेनेवाला और तीमारदारी या सेवा-शुश्रूषा करनेवाला न हो । अगर सौभाग्यसे भर जायँ, तो कोई शोक करनेवाला भी न हो ।
हमसखुन=हम-जैसा कलाम कहने वाला । हमजवों=हमारी भाषा बोलने वाला । दर=द्वार, दरवाजा । दूरो=दूर+ओ=दूरवाजा और । दीवार=भीत । हमसाथा=पड़ोसी । पासवों=साथ रहने वाला । गर=अगर । तीमारदार=सेवा-दृष्टि करनेवाला । नोहावों=शोक करने वाला, रोनेवाला ।
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