भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( २०६ )

इसी लिये कहता हूँ, कि तु दूसरोंको राजी करनेकी अपेक्षा अपने तर्क ही राजी कर, इससे तुझे निश्चय ही उसकी प्राप्ति होगी, जिसके समान त्रिलोकियोंमें और कोई नहीं है। जिस समय उसकी अनुपम छवि तेरी आँखोंमें समा जायगी, उस समय तुझे और कुछ अच्छा न लगेगा ; केवल वही अच्छा लगेगा। महाकवि रहीमने कहा है—

प्रीतम-छवि नयनन बसी, पर-छवि कहाँ समाय ।

भरी सराय “रहीम” लखि, आप पथिक फिर जाय ॥

जब आँखोंमें प्यारे कृष्णकी सुन्दर मनमोहिनी छवि समा जाती है, तब उनमें और किसीकी छवि समा नहीं सकती। जबतक नयनोंमें मुगली मनोहरकी छवि नहीं समाती, नयन उसकी छविसे खाली रहते हैं, तभीतक मामूली छवि उनमें समाती रहती है। जिस तरह सरायको भरी हुई देख कर, उसमें कोठरियाँ खाली न पाकर, मुसाफिर लौट जाते हैं ; उसी तरह नयनोंमें मनमोहनकी बाँकी छवि देखकर और संसारी मिथ्या खूबसूरतियाँ नयनोंके पास भी नहीं फटकतीं। जब दिलमें परम प्यारे कृष्णका डेरा लग जाता है, तब उसमें सुन्दरी कामिनियाँ और लक्ष्मी प्रभृति किसीको भी स्थान नहीं मिलता ; अर्थात् दिलको उसके मुकाबलेमें संसारके अच्छे-से-अच्छे पदार्थ—स्त्री-पुत्र और धन-दौलत प्रभृति—तुच्छातितुच्छ जँचते हैं।