भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( १०८ )

में ही सन्तुष्ट रहे, तो तू स्वयं चिन्तामणि-स्वरूप हो जाय । फिर तेरी कौनसी इच्छा पूरी न हो ? ॥३४॥

मन ही सब कामोंका कर्ता है । सभी इन्द्रियां मनके ही अधीन और मनकी ही अनुगामिनी हैं । मन ही बन्धन और मोक्षका कारण है । मनुष्य मनसे ही पाप-पुण्य और दुःख-सुख प्रभृतिका भागी होता है । मन ही मनुष्यको बुढ़ा-भला, साधु-असाधु सब कुछ बना देता है । मनकी वृत्ति सुधरनेसे ही, मनके वासना-हीन होनेसे ही, सब कुछ त्यागनेसे हो, वह आत्मसाक्षात्कारके योग्य हो जाता है ; इसी लिये कोई ज्ञानी पुरुष मनको सम्बोधन करके कहता है,—

“अरे मन ! तू स्वयं तो मलिन और दुःखके भारसे दबा हुआ है ; फिर तू औरोंके दिल खुश करनेकी इतनी कोशिशें क्यों करता है, क्यों आफूमें उडाता है, क्यों मान खोता है और क्यों अपमान सहता है ? इससे तुझे क्या लाभ होगा ? मेरी बात माने तो तू इच्छाको त्याग दे, किसी भी चीज़की इच्छा मत रख ; तब तुझे शान्ति मिलेगी—परमानन्दकी प्राप्ति होगी । जब तू चिन्तामणिकी भाँति स्वच्छ हो जायगा, जब तू अपने स्वरूपको पहचान जायगा ; तब तुझे आत्मसाक्षात्कार हो जायगा, तुझे ब्रह्मज्ञान हो जायगा, तू ब्रह्मके प्रेममें लीन हो जायगा, हर्ष-विषाद और शोक-मोह तेरे पास न आवेंगे, अष्ट-सिद्धि और नवनिद्धि तेरे सामने हाथ बाँधे खड़ी रहेंगी । उस समय तेरी कोई अभिलाषा पूरी हुए बिना बाकी न रहेगी ।