भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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रहे, जिसके पत्थरोंको पवित्र गङ्गाजल पखार-पखारकर पवित्र करता हो। ऐसी हालतमें, संसारमें रहना—धूषा समय खोना है। कम-से-कम उस समय तो बुद्धिमान् एकान्तमें बैठकर, सब तरहकी आशा-तृष्णा छोड़कर, भगवान्के चरणकमलोंमें मन लगावे।

दोहा ।

गयो मान यौवन सुधन, भिजुक जात निराश ।

अब तौ मोकों उचित यह, श्रीगंगा तट वास ॥३३॥

33. When all our respect has gone, our riches have flown away, when the poor and the needy who came to us for help before and were given what they wanted have begun to be sent away with refusal, when all our relations and dear ones have left this world, it is but desirable for a wise man to take up his abode somewhere in the corner of some mountain-cave whose stones are washed by the holy waters of the Ganges.

परेषां चेतांसि प्रतिदिवसमाराध्य बहुधा

प्रसादं किं नेतुं विशसि हृदयक्षेकलिलम् ॥

प्रसन्ने त्वय्यन्तः स्वयमुदितचिन्तामणि गुणे

विमुक्तः संकल्पः किमभिलषितं पुष्यति न ते ॥३४॥

हे मलिन मन ! तू पराये दिलको प्रसन्न करनेमें किसलिए लगा रहता है ? यदि तू तृष्णाको छोड़कर सन्तोष करले, अपने

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