वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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32. The time of our youth, when we were fit for enjoying the company of jewel-bedecked women, has gone. We are tired of hankering after the pleasures of the world for a long time, Now we will pass our days on the holy banks of the heavenly Ganges cursing the misleading guiles of women and repeating the name of the Great Shiva in prayer.
माने म्लायिनि स्मृदिद्वे च वसुनि व्यर्थ प्रयातेऽर्थिनि
जीणे वन्धुजने गते परिजने नष्टे शनैर्थावने ।
शुक्तं केवलमेतदेव सुधियां यज्जहत्तुकन्यापयः-
पूतप्रावगिरीन्द्रकन्दरदुरीकुञ्जोनिवासः क्वचित् ॥ ३३ ॥
जब लोगोमें इज्जत-आनर न रहे; धन नाश हो जाय; याचक लौट-लौट कर जाने लगे; भाई-बन्धु, स्त्री-पुत्र और नाते-रिश्तेदार मर जायें; तब बुद्धिमानको चाहिए, कि किसी ऐसे पर्वत की गुहाके कोनेमें जा बसे, जिसके पत्थर गंगाजीके जलसे पवित्र हो रहे हों ॥३३॥
जब लोगोमें अपना मान न रहे, लोग नफ़रतकी नज़रसे देखने लगे, अपनी धन-दौलत जाती रहे; जो याचक पहले कुछ पाते थे, वे अब निर्धनताके कारण विमुख हो-होकर लौट आते हों; भाई-बन्धु और स्त्री-पुत्र प्रभृति नातेदार दूसरी दुनियाको बढे गये हों, तब तो बुद्धिमानको चाहिये कि संसारको त्याग दे; इसमें मोह न रखे और किसी ऐसे पहाड़की गुफामें जा