भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( १०५ )

अच्छी लगती है—यह बीमारी जवानीमें ही जोर करती है। किसीने ठीक ही कहा है:—

इरकूका जोश है जब तक, कि जवानीके हैं दिन ।

यह यज्ञ करता है शिद्ध, इन्हीं अय्याममें खास ॥

अब तो बुढ़ापेका दौरदौरा है, इस उम्रमें हम नाज़नियोंके साथ ऐसा कर भी नहीं सकते। इसके सिवा, अब हम सावधान भी हो गये हैं। हमने बेवकूफ़ों छोड़ दी है। हम बहुत दिनोंतक विषयोंमें ठीन रहे, हमने बहुत कुछ विषय-भोग भोगे; अब हम उनसे थक गये, उनसे हमारा जी ऊब गया। उनसे हमें कुछ भी सुख नहीं मिला। इसलिये अब हम गङ्गा-जीके किनारे बैठकर, संसार-बन्धनकी मूल और नरकको नसेनी सुन्दरियोंकी ममता छोड़, शिवसे प्रीति करेंगे और दिन-रात उन्हींका पवित्र एवं कल्याणकारी नाम जपेंगे, जिससे हमारा अन्तकाल तो सुधर जाय।

दोहा ।

रमणकाल यौवन गयो, थक्यो अमृत संसार ।

देहूँ गंगतट शेष वय, शिव-शिव जपत विसार ॥३२॥

इरकू=प्रेम । मञ्जु=रोग । शिद्ध=जोर । अय्याम=दिन । रमणकाल=स्त्री-भोग करनेका समय । यौवन=जवानी । अमृत=भटकते-भटकते । गंगतट=गंगाके किनारे । शेष वय=बाकी उम्र ।