वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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ज्वर-चर्दत-चर्दत अति ताप ज्यों; उत्तरत, सीतल होत तन ।
ल्योही मनकों मद उत्तरियों, लियों शील-सन्तोष-पन ॥३१॥
31. As long as I knew only very little I was blind with madness like an elephant and my mind was filled with the idea that I knew all. But when I came to learn a little by intercourse with wise men, my false conceit vanished away with the realisation that I knew nothing.
अतिकान्तः कालो लटभलनाभोगसुभगो
अमन्तः श्रान्ताः स्मः सुचिरमिह संसारसरणौ ।
इदानीं स्वःसिन्धोस्तदधुवि समाकन्दनगिरः
सुतौरैः फल्कौरैः शिवशिवशिवेति प्रतमुमः ॥३२॥
जेवरोसे सजी हुई स्त्रियोंके भोगने-योग्य जवानी चली गई ; और हम चिरकाल तक विषयोंके पीछे दौड़ते-दौड़ते थक भी गये । अब हम पवित्र जाहन्वी-तट पर, (ललचाने वाली) स्त्रियोंकी निन्दा करते हुए, शिव-शिव जपेंगे ॥३२॥
जिस पुरुषको, स्त्रियोंकी असलियत मालूम हो जानेसे, चिरकि हो गयी है ; वह कहता है—अब हमारी स्त्रियोंके भोगने-योग्य अवस्था—जवानी चली गई । अब वह लौटकर आयेगी नहीं, और यह बुढ़ापा जायगा नहीं । यह बला जवानोंमें ही
मदमत्त=मतवाला । कलुङ्ग=कुल्लू । हों=मैं । तबहि=तभी । सीतल=शीतल=ठण्डा । तन=शरीर । गर्वगुणको=विद्या या गुणका वृत्तगढ़ ।